गढ़वा. सृजन साहित्यिक मंच गढ़वा की ओर से हिंदी दिवस के अवसर पर सोमवार की शाम स्थानीय ज्ञान निकेतन कॉन्वेंट स्कूल में परिचर्चा सह काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया. स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी साहित्य की भूमिका विषय पर आयोजित परिचर्चा में मंच के सचिव सतीश कुमार मिश्र ने विषय प्रवेश कराया.
उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य ने स्वतंत्रता आंदोलन में सन 1857 से लेकर 1947 में देश की आजादी तक महती भूमिका निभायी थी. तत्कालीन साहित्यकारों ने कहानी, लेख, कविता आदि के माध्यम से अंग्रेजी शासन का विरोध किया और हिंदुस्तानवासियों के दिल में क्रांति की आग जलाने का काम किया.
साहित्यकारों की रचनाओं से आंदोलनकारियों को मिली दिशा
भारतेंदू हरिश्चंद्र, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भूषण आदि अनेक कवियों और कथाकारों का उदाहरण देते हुए श्री मिश्र ने कहा कि इनकी रचनाओं से आंदोलनकारियों को न सिर्फ बल मिला, बल्कि उन्हें एक दिशा भी मिली. अपनी रचनाओं से अंग्रेजी शासन का विरोध करने के कारण कई साहित्यकारों को जेल की सजा भी भुगतनी पड़ी थी.
इसके पश्चात युवा कवियित्री खूशबू उपाध्याय ने अपने जोशीले अंदाज में मातृशक्ति की भूमिका पर प्रकाश डाला. चर्चा में गीतकार धनंजय कुमार ने बलिदानियों की याद में तिरंगा को फहराया है… नामक रचना से विषय पर ध्यान केंद्रित किया. इसे आगे बढ़ाते हुए योगेंद्र प्रसाद सिंह ने बाबू कुंवर सिंह पर अपनी रचना लिखत बानी पाति जगावे खातिर, जागल जवानिया देखावे खातिर… सुनायी.
पत्र-पत्रिकाओं ने भी निभायी महत्वपूर्ण भूमिका
अधिवक्ता राकेश त्रिपाठी ने स्वतंत्रता आंदोलन में उदंड मार्तंड, बनारस अखबार, बंधु आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका का उल्लेख किया. शिक्षक पंकज कुमार मिश्र ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन और हिंदी दोनों एक-दूसरे के पूरक रहे हैं.
सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी रामनारायण गुप्ता ने कहा कि हिंदी को हम बोले भर नहीं, महसूस भी करें. बाबू दिनेश सिंह विवि के विधि महाविद्यालय के प्राचार्य रंगनाथ सिंह ने कहा कि साहित्यकारों को हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए मजबूत पहल करने की जरूरत है.
मंच के उपाध्यक्ष राजमणि राज ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी साहित्य ने मुख्य हथियार के रूप में भूमिका निभायी.
कविताओं ने बांधा समां, खूब मिली तालियां
शिक्षक आशीष अविरल चतुर्वेदी ने भारतीय होने का प्रमाण रही हिंदी… शीर्षक पंक्ति की रचना सुनाकर खूब तालियां बटोरीं. युवा रचनाकार सौरभ तिवारी ने हिंदुस्तान है हिंदी से, अपनी पहचान है हिंदी से… सुनाकर सबको प्रभावित किया.
मंच के संरक्षक रासबिहारी तिवारी ने कहा कि चाहे धर्म की रक्षा हो, समाज की अथवा आजादी की लड़ाई, सबमें हिंदी ने आगे बढ़कर भूमिका निभायी है. उन्होंने अपनी रचना भारतभूमि की भाल पे चमके चम चम चम चम हिंदी… कविता से भी श्रोताओं को आकर्षित किया.
हिंदी को सम्मान देने के लिए जागरूकता पर जोर
ज्ञान निकेतन विद्यालय के निदेशक मदन केसरी ने कहा कि सृजन साहित्यिक मंच को अपनी पुरानी भूमिका में आने की जरूरत है. यह समय की मांग है.
मंच का संचालन करते हुए साहित्यकार प्रमोद कुमार ने आह्वान किया कि हिंदी को सम्मान देने और इसके प्रति लोगों को जागरूकता लाने के लिए अपने स्टेटस में हिंदी से जुड़ी उक्तियों को शामिल करें. परिचर्चा में अधिवक्ता राकेश शुक्ला, मुकेश चौबे आदि ने भी भाग लिया.
साहित्यकारों से फिर भूमिका निभाने का आह्वान
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अध्यक्ष विनोद पाठक ने वंदे मातरम् और इंकलाब-जिंदाबाद आदि नारों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई साहित्यकारों के एक शब्द से आंदोलन को गति मिल जाती थी. आज समाज में व्याप्त विषमताओं को दूर करने के लिए साहित्यकारों को उसी तरह पुन: भूमिका निभाने की जरूरत है.
