गढ़वा: जिले की शहरी आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी बुनियादी नागरिक सुविधाओं, सामाजिक सुरक्षा और स्थायी रोजगार के लिए जूझ रहा है. गढ़वा नगर परिषद, श्री बंशीधर नगर और मझिआंव नगर पंचायत की भौगोलिक व सामाजिक परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में सामने आ रही समस्याएं लगभग एक जैसी हैं. हाल में उपायुक्त पशुपतिनाथ मिश्रा की प्रशासनिक समीक्षा बैठक में नगर विकास एवं आवास विभाग की योजनाओं की स्थिति की समीक्षा के दौरान कई कमियां सामने आयीं. इससे कागजी प्रगति और धरातलीय स्थिति के बीच का अंतर स्पष्ट हुआ.
गढ़वा नगर परिषद में पेयजल और स्ट्रीट वेंडरों की समस्या
जिला मुख्यालय होने के कारण गढ़वा नगर परिषद पर बुनियादी सुविधाओं का दबाव अधिक है. अमृत 2.0 के तहत हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के लिए पाइपलाइन बिछाने की गति धीमी है. वहीं पीएम स्वनिधि के तहत फुटपाथ विक्रेताओं को पहचान पत्र देने की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन बैंक से क्रेडिट लिंकेज मिलने में देरी हो रही है. आश्रयहीन लोगों के लिए संचालित शेल्टर होम तक जरूरतमंदों की पहुंच बढ़ाने के लिए भी जागरूकता पर जोर दिया गया.
श्री बंशीधर नगर में रोजगार योजनाओं की रफ्तार धीमी
धार्मिक और व्यावसायिक केंद्र के रूप में पहचान रखने वाले श्री बंशीधर नगर में मुख्यमंत्री श्रमिक योजना के तहत अकुशल शहरी श्रमिकों को 100 दिनों का रोजगार देने की प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ रही है. जॉब कार्ड बनने और काम मिलने के बीच अंतर बना हुआ है. महिला स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने तथा युवाओं को स्वरोजगार के लिए ऋण उपलब्ध कराने की योजनाओं में भी सुस्ती सामने आयी.
मझिआंव में सत्यापन और डिजिटल प्रक्रिया पिछड़ी
मझिआंव नगर पंचायत में ग्रामीण और शहरी आबादी के मिश्रित स्वरूप के बीच योजनाओं का क्रियान्वयन चुनौती बना हुआ है. पीएम किसान सम्मान निधि से जुड़े डेटा सुधार और शत-प्रतिशत सत्यापन का काम पूरा नहीं हो सका है. स्वनिधि से समृद्धि अभियान से लाभुकों को जोड़ने तथा फुटपाथ विक्रेताओं के डिजिटल सत्यापन और पहचान पत्र जारी करने की प्रक्रिया भी धीमी है.
बैंक और जागरूकता की कमी बनी बड़ी बाधा
समीक्षा में सामने आया कि सेल्फ एंप्लॉयमेंट प्रोग्राम और क्रेडिट लिंकेज में बैंक स्तर पर ऋण स्वीकृति में देरी हो रही है. इससे शहरी गरीबों और युवाओं के स्वरोजगार की राह बाधित है. वहीं मुख्यमंत्री श्रमिक योजना और शेल्टर होम जैसी सुविधाओं के पर्याप्त प्रचार-प्रसार के अभाव में जरूरतमंदों तक योजनाओं की जानकारी नहीं पहुंच रही है. अमृत 2.0 की सिटी प्रोग्रेस रिपोर्ट की समीक्षा में कार्यदायी संस्थाओं की धीमी कार्यशैली भी सामने आयी.
उपायुक्त ने सभी लंबित योजनाओं में निर्धारित समय सीमा के भीतर सुधार और अपेक्षित प्रगति सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है. अब देखना होगा कि समीक्षा में सामने आयी कमियों का असर धरातल पर कितनी तेजी से दिखाई देता है.
