जितेंद्र सिंह की रिपोर्ट गढ़वा. झारखंड के गढ़वा में पली-बढ़ी अदिति गुप्ता ने अपने व्यक्तिगत अनुभव, रचनात्मक सोच और डिजाइन की ताकत को सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाकर देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है.कभी गढ़वा की गलियों और सेंट मैरी स्कूल में पढ़ने वाली अदिति आज पीरियड्स और किशोरावस्था से जुड़ी शिक्षा के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं.
पति के साथ मिलकर अदिति ने ‘मेंस्ट्रूपीडिया’ की शुरुआत
अपने पति तुहिन पॉल के साथ मिलकर उन्होंने ‘मेंस्ट्रूपीडिया’ की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य मासिक धर्म और किशोरावस्था से जुड़े विषयों पर बच्चों और अभिभावकों के बीच मौजूद झिझक और संवाद की कमी को दूर करना है. आज उनकी यह पहल भारत सहित दुनिया के 23 से अधिक देशों तक पहुंच चुकी है.अदिति ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गढ़वा के सेंट मैरी स्कूल से 10वीं तक पूरी की। इसके बाद उन्होंने आगरा के एचसीएसटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, गांधीनगर, गुजरात से पोस्ट ग्रेजुएशन किया. वर्तमान में वह अहमदाबाद में रहकर अपने सामाजिक और शैक्षणिक प्रयासों को आगे बढ़ा रही हैं.
गढ़वा में बीता बचपन, वहीं से मिली बदलाव की प्रेरणा
अदिति के काम की कहानी उनके अपने बचपन से जुड़ी है. गढ़वा में बड़ी होते समय उन्होंने पीरियड्स को लेकर वही शर्म, संकोच, रहस्य और सही मार्गदर्शन की कमी महसूस की, जिसका सामना देश की लाखों किशोरियां करती हैं. उस समय परिवार और समाज में इस विषय पर खुलकर बातचीत का माहौल नहीं था.अदिति बताती हैं कि उनके माता-पिता ने बेहतर शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए गढ़वा की अपनी आरामदायक जिंदगी छोड़कर रांची जाने का बड़ा निर्णय लिया. वह और उनके दो भाई बेहतर स्कूलों में पढ़ सकें, इसके लिए परिवार ने शहर बदला. उनके पिता गढ़वा में अधिवक्ता रहे और वर्तमान में रांची हाईकोर्ट में सरकारी वकील हैं.गढ़वा से शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर अदिति को डिजाइन और सामाजिक उद्यमिता की दुनिया तक ले गया. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन में न्यू मीडिया डिजाइन की पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात और साझेदारी तुहिन पॉल के साथ हुई. दोनों ने किशोरों के साथ काम करते हुए महसूस किया कि पीरियड्स को लेकर समाज में वर्षों बाद भी वही चुप्पी और झिझक बनी हुई है.
शोध से सामने आई समस्या, डिजाइन से खोजा समाधान
अदिति और तुहिन ने इस विषय को केवल व्यक्तिगत अनुभव के रूप में नहीं देखा, बल्कि लड़कियों, अभिभावकों और गायनेकोलॉजिस्ट के साथ गहन उपयोगकर्ता शोध किया. शोध में सामने आया कि स्कूलों में उपलब्ध पारंपरिक जीव विज्ञान की किताबें पीरियड्स के विषय को मुख्य रूप से क्लिनिकल तरीके से समझाती हैं. दूसरी ओर अभिभावकों के लिए बच्चों से इस विषय पर बातचीत शुरू करना भी आसान नहीं था.इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए दोनों ने ऐसी सामग्री तैयार करने का फैसला किया, जो वैज्ञानिक रूप से सही होने के साथ बच्चों के लिए सहज और रोचक भी हो. इसी सोच से ‘मेंस्ट्रूपीडिया कॉमिक’ अस्तित्व में आई. इसमें दोस्ताना किरदारों और कहानी के माध्यम से मासिक धर्म और किशोरावस्था से जुड़ी जानकारी दी गई, ताकि बच्चों को इस विषय पर बात करने में झिझक महसूस न हो.
2012 में हुई शुरुआत, 2013 में मिला बड़ा सहारा
वर्ष 2012 में मेंस्ट्रूपीडिया की शुरुआत की गई. शुरुआत एक डिजाइन रिसर्च प्रोजेक्ट के तौर पर हुई थी, लेकिन जल्द ही इस पहल को लोगों का समर्थन मिलने लगा. वर्ष 2013 में सफल क्राउडफंडिंग अभियान के माध्यम से भौतिक कॉमिक बुक को बड़े स्तर पर प्रकाशित करने में मदद मिली.इसके बाद मेंस्ट्रूपीडिया ने धीरे-धीरे भारत के विभिन्न हिस्सों में अपनी पहुंच बनाई और फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विस्तार किया.आज यह पहल 20 से अधिक भाषाओं में उपलब्ध है. हिंदी, गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगाली, असमिया, ओड़िया, पंजाबी, उर्दू और तिब्बती समेत कई भारतीय भाषाओं में इसकी सामग्री उपलब्ध है.
1.5 करोड़ से अधिक बच्चों तक पहुंच
मेंस्ट्रूपीडिया के अनुसार, कॉमिक बुक, शैक्षणिक कार्यशालाओं, डिजिटल सामग्री और विभिन्न साझेदारियों के माध्यम से इसकी पहुंच दुनिया भर में 1.5 करोड़ से अधिक बच्चों तक हो चुकी है. भारत में 37,500 से अधिक स्कूलों में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है.इसके अलावा मेंस्ट्रूपीडिया की सामग्री 23 से अधिक देशों में इस्तेमाल की जा रही है. 11 देशों में स्थानीय स्तर पर इसका सह-प्रकाशन और प्रिंटिंग की गई है, जबकि दुनिया के 20 से अधिक देशों में इसकी सामग्री वितरित और भेजी गई है.
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नौ राज्य सरकारों के कार्यक्रमों में शामिल
मेंस्ट्रूपीडिया का काम केवल स्कूलों और परिवारों तक सीमित नहीं है. भारत में नौ राज्य सरकारों ने इसे मासिक धर्म स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल किया है. बड़े स्तर पर समुदाय तक पहुंच बनाने के लिए 27 से अधिक कॉरपोरेट साझेदारों के साथ भी काम किया गया है. यूनिसेफ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी इसकी सामग्री को अपनाया है.इस पहल का मूल उद्देश्य मासिक धर्म को लेकर समाज में मौजूद चुप्पी को कम करना और किशोरियों को ऐसी जानकारी उपलब्ध कराना है, जिससे वे अपने शरीर में होने वाले बदलावों को समझ सकें और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकें.
पीरियड्स से आगे अब जीवन कौशल की शिक्षा
किशोरों के साथ एक दशक से अधिक समय तक काम करने के दौरान अदिति और तुहिन ने महसूस किया कि बच्चों के सामने केवल शारीरिक बदलावों को समझने की चुनौती नहीं होती. बड़े होने के दौरान उन्हें समय प्रबंधन, भावनात्मक समझ, वित्तीय जानकारी और अच्छी आदतें विकसित करने जैसी कई जरूरी चीजों की भी आवश्यकता होती है. इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए दोनों ने ‘ट्रूबडी कॉमिक्स’ की शुरुआत की. यह कॉमिक सीरीज प्री-टीन्स को आदत निर्माण, समय प्रबंधन, वित्तीय साक्षरता और भावनात्मक समझ जैसी जीवन कौशल से परिचित कराने का प्रयास करती है. इस पहल पर 1.5 लाख से अधिक परिवारों के भरोसे का दावा किया गया है. इसका उद्देश्य ऐसी पीढ़ी तैयार करना है, जो केवल अकादमिक शिक्षा तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन की व्यावहारिक चुनौतियों से निपटने के लिए भी तैयार हो.
फोर्ब्स इंडिया और बीबीसी ने भी पहचाना काम
अदिति गुप्ता के काम को देश और दुनिया में कई मंचों पर पहचान मिली है. उन्हें फोर्ब्स इंडिया की ‘30 अंडर 30’ सूची में शामिल किया गया है. बीबीसी की 100 प्रभावशाली महिलाओं की सूची में भी उनका नाम शामिल हो चुका है. इसके अलावा उन्हें लोकप्रिय कारोबारी कार्यक्रम ‘शार्क टैंक इंडिया’ के माध्यम से निवेश भी मिला.उनकी उपलब्धियां इस बात का उदाहरण हैं कि सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए रचनात्मक सोच और तकनीक का इस्तेमाल किस तरह बड़े स्तर पर बदलाव ला सकता है.
महिलाओं और बच्चों को सशक्त बनाने की दिशा में प्रयास
अदिति का काम केवल पीरियड्स की जानकारी देने तक सीमित नहीं है. वह बच्चों और किशोरों को अपने शरीर, भावनाओं और जीवन से जुड़े फैसलों को बेहतर ढंग से समझने में सक्षम बनाने की दिशा में काम कर रही हैं. उनका मानना है कि बच्चों को सही उम्र में सही जानकारी देना उनके आत्मविश्वास और भविष्य के लिए बेहद जरूरी है.साथ ही वह अभिभावकों को भी बच्चों के साथ संवेदनशील विषयों पर सहज बातचीत करने के लिए तैयार करने पर जोर देती हैं. उनका प्रयास है कि बच्चों के बड़े होने की प्रक्रिया डर, शर्म और चुप्पी के बजाय सही जानकारी, संवाद और आत्मविश्वास के साथ पूरी हो.
