गढ़वा : गढ़वा जिले में मजदूरी के लिए निकले बेरोजगारों के मरने का सिलसिला थम नहीं रहा है़ काम के अभाव में गढ़वा जिले से आये दिन लोग बाहर के प्रदेशों में जाते हैं, जहां से दुर्घटनाओं में उनकी मौत की खबर आना आम बात हो गयी है़ विदित हो कि खेती के समय में यहां से हजारों की संख्या में महिला व पुरुष मजदूर काम के लिए निकलते हैं.
लेकिन वे काम करने के बाद अपनी कमाई के साथ सकुशल घर वापस लौट ही जायें, यह कोई जरूरी नहीं है़ यदि झारखंड बनने के बाद खेतीहर मजदूरों से जुड़े घटनाओं पर दृष्टिपात किया जाये, तो 70 से अधिक महिला-पुरुष मजदूरों की मौत हो चुकी है़
इसके अलावा छिटपुट घटनाओं में करीब 500 मजदूर विभिन्न दुर्घटना के शिकार हो गये हैं. जिले से न सिर्फ खेती के समय में बल्कि अन्य समयों में भी सालों पर यहां से बेरोजगार युवा काम की तलाश में छत्तीसगढ़, गुजरात, पंजाब, हरियाणा अथवा दक्षिण के राज्यों में पलायन करते रहते हैं. अकुशल मजदूर होने के कारण अक्सर इनका काम जोखिम भरा रहता है़ कई मजदूर तो उचित खान-पान के अभाव में बीमारी के शिकार हो जाते हैं.
बीमार पड़ने पर उनका उचित इलाज नहीं हो पाने के कारण उनकी लाश ही घर पहुंचती है़ साथ ही यहां से सैकड़ों की संख्या में सरिया सेंटरिंग के लिए मजदूर बाहर जाते हैं, जहां अनुभव के अभाव में अक्सर ऊंचे दीवार अथवा छतों से गिर कर उनकी मौत होती रहती है़ इन सब घटनाओं की खबर लगातार प्रकाशित होते रहने के बावजूद न तो यहां से मजदूरों का पलायन रोकने के लिये ठोस पहल की गयी और न ही बेबश मजदूर काम की तलाश में बाहर जाने से अपने आप को रोक पाये़
यदि सरकार द्वारा चलायी जा रही मनरेगा को सही रूप से क्रियान्वित किया जाता, तो चार मई की रात वाली घटना में गढ़वा के मजदूर मौत के शिकार नहीं होते़ विडंबना है कि जो मां एवं पत्नियां अपने बेटे व पति को कमाने के लिये बाहर भेजती हैं, उनकी कमाई तो उनका जीवन में बदलाव नहीं ला पाता, बल्कि उनके जान से भी हाथ धोना पड़ता है़
