रांची. 11 राज्यों की विभिन्न स्टेट बार काउंसिल की महिला अधिवक्ताओं ने बार काउंसिल में को-ऑप्शन और नामांकन की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाये हैं. मंगलवार को "बार की स्वतंत्रता दांव पर" विषय पर आयोजित वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में अधिवक्ताओं ने कहा कि महिला प्रतिनिधित्व जरूरी है, लेकिन इसके लिए अपनायी जाने वाली प्रक्रिया पारदर्शी, वस्तुनिष्ठ और लोकतांत्रिक होनी चाहिए.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में वरीय अधिवक्ता एन.डी. पंचोली ने कहा कि किसी भी निर्वाचित बार निकाय में नामांकन का कोई भी स्वरूप बार की स्वतंत्रता से जुड़ा मौलिक सवाल खड़ा करता है. उन्होंने वर्तमान को-ऑप्शन व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए धुलिया समिति की रिपोर्ट पर सार्थक रूप से विचार करने की मांग की.
निर्वाचित सीटों को नामांकित सीटों में बदलने पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट के वरीय अधिवक्ता और बार काउंसिल ऑफ दिल्ली के सदस्य मेहमूद प्राचा ने कहा कि मामला केवल दो महिला सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि बार की पूरी लोकतांत्रिक संरचना से जुड़ा है. उन्होंने सवाल उठाया कि 25 सदस्यीय बार काउंसिल की निर्वाचित सीटों को किस आधार पर नामांकित सीटों में बदला जा सकता है.
उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर अधिवक्ताओं और बार एसोसिएशनों को लोकतांत्रिक आंदोलन का सहारा लेना पड़ सकता है. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब यह विषय सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित था, तब को-ऑप्शन की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ी.
वरिष्ठता को चयन का आधार बनाने पर भी आपत्ति
कर्नाटक की वरिष्ठ अधिवक्ता विजयलक्ष्मी ने चयन में "वरिष्ठता" को आधार बनाये जाने पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि लंबे समय से प्रैक्टिस कर रही और चुनाव लड़कर अधिवक्ताओं का प्रत्यक्ष जनादेश हासिल करने वाली महिला अधिवक्ताओं को नजरअंदाज करना उचित नहीं है.
रेनू अग्रवाल ने भी मौजूदा प्रक्रिया को अनुचित बताया. सुरूचि मित्तल ने चयन के लिए वस्तुनिष्ठ और पारदर्शी मानदंड की जरूरत बतायी. उन्होंने सवाल उठाया कि निर्वाचित प्रतिनिधि कौन होना चाहिए और उसे चुनने का अधिकार किसके पास होना चाहिए.
"बार काउंसिल अधिवक्ताओं के जनादेश का प्रतिनिधित्व करती है"
निमरता गिल ने कहा कि स्टेट बार काउंसिल का निर्वाचन क्षेत्र व्यापक है और कई बार काउंसिल में एक लाख से अधिक अधिवक्ता शामिल हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि जिला न्यायालयों में प्रैक्टिस करने वाले बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं के प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखा जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, "बार काउंसिल अधिवक्ताओं के जनादेश का प्रतिनिधित्व करती है, न्यायपालिका के जनादेश का नहीं." उन्होंने यह भी कहा कि अधिवक्ताओं की संख्या बढ़ने के साथ प्रतिनिधित्व के लिए सीटों की संख्या बढ़ाने पर भी विचार होना चाहिए.
बार और बेंच की स्वतंत्रता पर जोर
उत्तराखंड की अधिवक्ता शिवांगी गंगवार ने विभिन्न राज्यों में पक्षपात की शिकायतों का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनावी जनादेश को दरकिनार कर प्रतिनिधिक निकायों में प्रवेश का समानांतर रास्ता नहीं बनाया जाना चाहिए.
प्रेस कॉन्फ्रेंस की मॉडरेटर और झारखंड हाईकोर्ट की अधिवक्ता स्वाति सिन्हा ने कहा कि बार और बेंच को समानांतर एवं स्वतंत्र संस्थाओं के रूप में कार्य करना चाहिए. उन्होंने कहा कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की प्रक्रिया में भी बार की स्वतंत्रता से समझौता नहीं होना चाहिए.
को-ऑप्शन के लिए पारदर्शी दिशा-निर्देश की मांग
महिला अधिवक्ताओं ने कहा कि वे बार निकायों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के प्रयासों का समर्थन करती हैं. उनकी आपत्ति प्रतिनिधित्व के उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसे हासिल करने की प्रक्रिया से है.
उन्होंने को-ऑप्शन के लिए स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था, समान एवं वस्तुनिष्ठ चयन मानदंड तय करने, हितधारकों की सिफारिशों पर प्रभावी विचार करने और धुलिया समिति की रिपोर्ट पर उचित कार्रवाई की मांग की. साथ ही अधिवक्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली सीटों के निर्वाचित चरित्र की रक्षा करने की मांग रखी.
प्रस्ताव पारित कर आंदोलन जारी रखने का निर्णय
प्रेस कॉन्फ्रेंस में बार की स्वतंत्रता की रक्षा, चुनाव में अधिवक्ताओं का जनादेश हासिल करने वाली योग्य महिला उम्मीदवारों को को-ऑप्शन के माध्यम से निर्वाचित घोषित करने, को-ऑप्शन के लिए समान एवं पारदर्शी दिशा-निर्देश तय करने तथा 26 और 27 अप्रैल 2026 की बैठक की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग से जुड़े प्रस्ताव पारित किये गये.
अधिवक्ताओं ने कहा कि लोकतांत्रिक अभियान शांतिपूर्ण तरीके से जारी रखा जायेगा और आवश्यकता पड़ने पर शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन समेत लोकतांत्रिक उपाय अपनाये जायेंगे.
