रांची से नवीन शर्मा की रिपोर्ट
रांची: खूंटी की निर्मला सांग की कहानी सिर्फ एक नौकरी की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की है जिसमें एक बेटी ने अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए लाखों रुपये की नौकरी के अवसर छोड़ सरकारी नौकरी का रास्ता चुना. वर्षों तक परीक्षाओं, रद्द होते विज्ञापनों और अटकी नियुक्तियों से लड़ने के बाद जब JSSC-CGL में सफलता मिली, तो लगा था कि अब संघर्ष खत्म हो गया. लेकिन नियुक्ति रद्द होने के फैसले ने उन्हें एक बार फिर उसी मोड़ पर ला खड़ा किया है.
इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद भी एक अच्छी प्राइवेट नौकरी छोड़कर सरकारी नौकरी की तैयारी करना आसान फैसला नहीं होता. खूंटी जिले की रहने वाली निर्मला सांग ने यह फैसला लिया था. वजह सिर्फ सरकारी नौकरी नहीं थी, बल्कि अपने माता-पिता के साथ रहना भी था. मल्टीनेशनल कंपनियों में नौकरी के अवसर थे, लेकिन उन्हें डर था कि नौकरी के लिए बाहर चली गईं तो माता-पिता से दूर हो जाएंगी.
इसी सोच के साथ शुरू हुआ सरकारी नौकरी का करीब 10 साल लंबा संघर्ष. इस दौरान कई विज्ञापन आए, कई रद्द हुए, परीक्षाएं अटकीं और नियुक्तियां लंबी प्रक्रिया में फंसती रहीं. निर्मला ने हर बार खुद को संभाला और तैयारी जारी रखी.
इंजीनियरिंग के बाद सरकारी नौकरी को चुना
निर्मला ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी. उनके सामने प्राइवेट सेक्टर में करियर बनाने के कई विकल्प थे. मल्टीनेशनल कंपनियों में भी अवसर मिल सकते थे, लेकिन उन्होंने सरकारी नौकरी की तैयारी का रास्ता चुना.
उनका कहना है कि माता-पिता को छोड़कर बाहर जाकर नौकरी करना उनके लिए आसान नहीं था. वह अपने मां-बाप की जिम्मेदारी निभाना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने झारखंड में ही नौकरी पाने का सपना देखा. लेकिन सरकारी नौकरी की तैयारी का रास्ता उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं रहा.
विज्ञापन आते रहे, रद्द होते रहे... परीक्षाएं अटकती रहीं
निर्मला के मुताबिक, पिछले करीब एक दशक में कई बार सरकारी नौकरियों के विज्ञापन निकले. उन्होंने तैयारी की, परीक्षाओं की उम्मीद की, लेकिन कई बार प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी. कहीं विज्ञापन रद्द हुआ तो कहीं परीक्षा प्रक्रिया अटक गई. इस दौरान अभ्यर्थियों को आंदोलन करना पड़ा, इंतजार करना पड़ा और बार-बार नई उम्मीद के साथ तैयारी करनी पड़ी. इसी संघर्ष के बीच निर्मला का पंचायत सचिव के पद पर चयन हुआ. लेकिन यहां भी उनकी परेशानी खत्म नहीं हुई.
पंचायत सचिव की नौकरी के लिए भी करना पड़ा लंबा इंतजार
पंचायत सचिव की नियुक्ति की प्रक्रिया भी लंबे समय तक अटकी रही. अभ्यर्थियों को इसके लिए काफी संघर्ष करना पड़ा. आंदोलन और लगातार प्रयासों के बाद आखिरकार नियुक्ति का रास्ता साफ हुआ और निर्मला को पंचायत सचिव की नौकरी मिली. नौकरी मिलने के बाद भी उन्होंने पढ़ाई और तैयारी नहीं छोड़ी. वह बेहतर अवसर की तलाश में लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करती रहीं. आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और JSSC CGL में उनका चयन हो गया.
पंचायत सचिव की नौकरी छोड़ी, CGL ज्वाइन किया
JSSC CGL में चयन निर्मला के लिए वर्षों के संघर्ष के बाद मिली बड़ी कामयाबी थी. उन्होंने पंचायत सचिव की नौकरी छोड़ दी और JSSC CGL की नौकरी ज्वाइन कर ली. उन्हें लगा कि अब शायद उनकी जिंदगी का सबसे लंबा संघर्ष खत्म हो गया है. जिस सरकारी नौकरी के लिए उन्होंने करीब एक दशक तक मेहनत की, आखिरकार वह उनके हाथ में थी. लेकिन यह खुशी ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी.
10 साल संघर्ष किया... अब फिर बेरोजगार हूं
JSSC CGL की नियुक्ति रद्द किए जाने के फैसले के बाद निर्मला एक बार फिर बेरोजगार हो गई हैं. उनके सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस नौकरी के लिए उन्होंने पंचायत सचिव की नौकरी तक छोड़ दी, वह भी अगर नहीं रही तो वह कहां जाएंगी? उनकी पीड़ा सिर्फ नौकरी जाने की नहीं है. उन्होंने एक सुरक्षित सरकारी नौकरी छोड़कर JSSC CGL को चुना था. अब उनके पास न वह पुरानी नौकरी है और न ही नई नौकरी का भरोसा.
माता-पिता के लिए चुना था झारखंड, अब भविष्य पर सवाल
निर्मला कहती हैं कि अगर सिर्फ अपने करियर के बारे में सोचा होता तो इंजीनियरिंग के बाद प्राइवेट सेक्टर या किसी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी कर सकती थीं. लेकिन उन्होंने माता-पिता को प्राथमिकता दी. उन्होंने झारखंड में रहकर नौकरी करने का फैसला किया. इसके लिए उन्होंने वर्षों तक संघर्ष किया. आज वही फैसला उनके लिए सबसे बड़ी चिंता बन गया है.
जिस बेटी ने अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए बाहर की नौकरी का विकल्प छोड़ दिया, जिसने सरकारी नौकरी के लिए करीब 10 साल संघर्ष किया, जिसने पंचायत सचिव की नौकरी छोड़कर JSSC CGL ज्वाइन किया- वह अब फिर से बेरोजगारी के सामने खड़ी है.
एक बार फिर वहीं खड़ी हैं, जहां से सफर शुरू किया था
निर्मला की कहानी उन तमाम चयनित अभ्यर्थियों की कहानी है, जिन्होंने सिर्फ एक परीक्षा पास नहीं की थी, बल्कि अपनी जिंदगी के बड़े फैसले उस नौकरी को ध्यान में रखकर लिए थे. करीब 10 साल का संघर्ष, इंजीनियरिंग की डिग्री, पंचायत सचिव की नौकरी और फिर JSSC CGL की नौकरी... सब कुछ पीछे छूट गया. अब निर्मला के सामने सिर्फ एक सवाल है- 'क्या मेरी 10 साल की मेहनत फिर से शून्य हो गई?'
उनकी आंखों में नाराजगी से ज्यादा उस संघर्ष की थकान है, जिसे उन्होंने वर्षों तक जिया है. और सबसे बड़ा दर्द यही है कि जिस सरकारी नौकरी को हासिल करने के लिए उन्होंने अपनी एक नौकरी छोड़ी, उसी नौकरी के रद्द होने के बाद उन्हें एक बार फिर अपने भविष्य की शुरुआत करनी पड़ रही है.
