महुआ, चिरौंजी और कोचड़ा बेचकर ग्रामीण बन रहे आत्मनिर्भर

मार्च में 200 रुपये किलो बिकती है चिरौंजी, तो मई-जून में महुआ और कोचड़ा से होती है बेहतर कमाई

दिलीप पोद्दार, पटमदा: दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी क्षेत्र से सटे और दलमा इको विकास समिति के अंतर्गत आने वाले गांवों में रहने वाले आदिवासी व सबर समुदाय के पुरुष और महिलाओं की आजीविका का मुख्य साधन दलमा का घना जंगल बन गया है. तराई क्षेत्रों में रहने वाले सैकड़ों ग्रामीण जंगलों और उससे सटे इलाकों में होने वाले मौसमी फल-फूल जैसे आम, जामुन, कटहल, बेल, कुसुम, केंदू, महुआ, करंज (कोचड़ा), इमली, प्याल (चिरौंजी), बेर और आमड़ा आदि को चुनकर स्थानीय हाट-बाजारों में बेचते हैं. इससे होने वाली आमदनी से वे सालों भर अपने और अपने परिवार का बेहतर भरण-पोषण कर आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं.

दलमा जंगल के 192 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के तहत आने वाले 84 मौजा में सबसे अधिक महुआ के पेड़ हैं, जो ग्रामीणों के लिए एटीएम साबित हो रहे हैं. मार्च से अप्रैल के बीच ग्रामीण महुआ चुनकर इकट्ठा करते हैं और उसे सुखाकर 60 रुपये प्रति किलो की दर से बेचते हैं. इसी महुआ के पेड़ से मई व जून माह में फल के रूप में करंज (कोचड़ा) निकलता है, जिसे सुखाकर 50 रुपये किलो बेचा जाता है.

पगदा गांव के फुचु सबर और पिंकी सबर ने बताया कि उनका परिवार हर साल महुआ और कोचड़ा बेचकर ही घर का तेल-मसाला और जरूरत का सामान खरीदता है. 5 किलो कोचड़ा बेचने पर उन्हें बाजार में 1 किलो सरसों का तेल आसानी से मिल जाता है. वहीं, इसी गांव की चंपा रानी महतो ने बताया कि उनके पास महुआ के 10 पेड़ हैं. प्रत्येक पेड़ से लगभग 100 किलो महुआ का फूल निकलता है, जिसे सुखाकर वे बाजार में बेचती हैं.

रांची से आते हैं खरीदार

दलमा के जंगलों में सबसे कीमती वनोत्पाद मार्च के महीने में होने वाली प्याल पका यानी चिरौंजी का बीज है. ग्रामीण इसे जंगलों से चुनकर लाते हैं और 200 रुपये प्रति किलो की ऊंची दर पर बेचते हैं. इसकी गुणवत्ता इतनी बेहतरीन होती है कि इसे खरीदने के लिए रांची और पड़ोसी जिलों से बड़े-बड़े व्यापारी सीधे दलमा के गांवों में पहुंचते हैं.

दलमा में फलदार पेड़ों की भारी भरमार: रेंजर अर्पणा चंद्रा

दलमा की रेंजर अर्पणा चंद्रा ने बताया कि पूरे वन्य प्राणी क्षेत्र में अकेले महुआ के ही 5,000 से अधिक पेड़ हैं, जिसका सीधा आर्थिक लाभ स्थानीय ग्रामीणों को मिल रहा है. साथ ही भारी संख्या में कटहल और इमली के पेड़ भी मौजूद हैं. श्रीमती चंद्रा ने बताया कि वन विभाग पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीणों के सतत रोजगार को ध्यान में रखते हुए दलमा में कई लाख बांस के पौधे लगा चुका है. इसके अलावा, ग्रामीणों को अतिरिक्त रोजगार देने के लिए समय-समय पर वन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्लांटेशन का कार्य भी कराया जाता है, जिसमें स्थानीय ग्रामीणों को मजदूरी मिलती है.

दलमा क्षेत्र में पेड़ों की संख्या

महुआ: 5,000 से अधिक पेड़

बेल व प्याल (चिरौंजी): 3,000 – 3,000 पेड़

केंदू व बेर: 2,500 – 2,500 पेड़

आम व कुसुम: 2,000 – 2,000 पेड़

जामुन: 1,500 पेड़

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Published by: Dilip chandra poddar

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