मणिचयन मिश्र,रामगढ़ : रामगढ़ प्रखंड के डेढ़ दर्जन से अधिक गांवों में खीरे की खेती किसानों के लिए वैकल्पिक आय के बड़े स्रोत के रूप में उभरकर सामने आयी है. कम लागत, कम समय में तैयार होने वाली फसल, लगातार उपज और बेहतर बाजार भाव के कारण बड़ी संख्या में किसान खीरे की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं. क्षेत्र में उत्पादित खीरे की मांग आसपास की सब्जी मंडियों के साथ बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड के विभिन्न शहरों में भी बनी हुई है. बड़ी रणबहियार पंचायत के इटबंधा, बगबिंधा, सुहोदुहो, फुलजोरा, भालसुमर पंचायत के गम्हरिया हाट, मोची खमार, कुरुआ कित्ता, पथरिया, कांजो पंचायत के घोड़दोड़, लुटिया, तिलाटांड़, डुमरजोर, छोटी रणबहियार पंचायत के गिधबना और सेजा पहाड़ी सहित कई गांवों के किसान इस वर्ष बड़े पैमाने पर खीरे की खेती कर रहे हैं. खेतों में तैयार खीरा स्थानीय बाजारों से लेकर दूरदराज की मंडियों तक पहुंच रहा है.
बिहार की मंडियों में जा रहा प्रतिदिन खीरा
अपने बेहतर स्वाद और गुणवत्ता के कारण रामगढ़ के खीरे की मांग लगातार बनी हुई है. मध्य जुलाई से ही क्षेत्र से प्रतिदिन लगभग ढाई दर्जन से अधिक मिनी ट्रकों से खीरा बिहार की विभिन्न मंडियों में भेजा जा रहा है. पटना, हाजीपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय, बरौनी और मुजफ्फरपुर जैसे शहरों में यहां के खीरे की अच्छी मांग है. इसके अलावा दर्जनों ऑटो और सैकड़ों मोटरसाइकिलों से छोटे व्यापारी गोड्डा, महगामा, पथरगामा, ललमटिया, बौंसी, बांका, मोहनपुर, जरमुंडी, देवघर, बासुकिनाथ, दुमका, जामताड़ा और पाकुड़ के बाजारों में बिक्री के लिए खीरा लेकर जाते हैं. सावन में देवघर और बासुकिनाथ में कांवरियों की भारी भीड़ उमड़ने के कारण कांवरिया मार्ग पर संचालित सैकड़ों छोटे-बड़े होटल और भोजनालयों में भी खीरे की मांग बढ़ जाती है. इसका सीधा लाभ रामगढ़ के किसानों और स्थानीय व्यापारियों को मिल रहा है.
रामगढ़-हंसडीहा मार्ग पर पहुंच रहे आढ़ती
रामगढ़-हंसडीहा मार्ग पर इटबंधा से लेकर गिधबना तक प्रतिदिन बड़ी संख्या में आढ़ती और सब्जी व्यापारी पहुंच रहे हैं. खेतों से निकलने के बाद किसानों की उपज की खरीद गांव के आसपास ही हो जा रही है. इससे किसानों को अपनी उपज लेकर दूर की मंडियों तक जाने की जरूरत कम पड़ रही है. स्थानीय व्यापारियों के अनुसार रामगढ़ प्रखंड से प्रतिदिन करीब 25 से 30 लाख रुपये मूल्य की खीरे की उपज बाहर की मंडियों में भेजी जा रही है. खीरे के इस कारोबार से क्षेत्र में नकदी का प्रवाह भी बढ़ा है.
कम लागत और कम समय में अधिक लाभ
कुछ वर्ष पहले तक करेले और झिंगली की खेती करने वाले कई किसान अब बड़े पैमाने पर खीरे की खेती से जुड़ गये हैं. अन्य फसलों की तुलना में खीरे की खेती में कम समय और कम लागत लगती है. साथ ही उत्पादन शुरू होने के बाद लगातार खीरा टूटता है, जिससे किसानों को रोजाना आमदनी होती है. कुरुआ कित्ता के प्रगतिशील किसान धर्मदेव अर्हक बताते हैं कि खीरे की खेती में लागत कम और लाभ अधिक है. खेती शुरू करने के सामान्यतः 35 से 40 दिनों के बाद खीरा तोड़ने लायक हो जाता है. इसके बाद नियमित रूप से खीरा निकलता रहता है. बाजार में अच्छी कीमत मिलने से किसानों को बेहतर आमदनी हो रही है.
मोबाइल और इंटरनेट से दूर के बाजार से जुड़ रहे किसान
खीरे के व्यापार से जुड़े आढ़ती रामकृष्ण इस्सर उर्फ बिहारी कहते हैं कि मोबाइल फोन और इंटरनेट की सुविधा ने क्षेत्र के खीरे के लिए बड़ा बाजार उपलब्ध करा दिया है. दूर-दराज के व्यापारी फोन के माध्यम से खीरे का ऑर्डर भेज देते हैं. भुगतान भी यूपीआई के माध्यम से हो जाता है. उन्होंने बताया कि आढ़ती किसानों से खीरा खरीदकर बाहरी मंडियों में भेजते हैं. इससे किसानों को अपनी उपज का मूल्य तत्काल या शीघ्र मिल जाता है. बाजार की यह व्यवस्था किसानों के लिए सुविधाजनक साबित हो रही है.
18 से 26 रुपये किलो तक मिल रहा भाव
जानकारों के अनुसार बाजार में उतार-चढ़ाव का खीरे की बिक्री पर अपेक्षाकृत कम असर पड़ता है. व्यापारी और कमीशन एजेंट किसानों से औसतन 18 से 26 रुपये प्रति किलो की दर से खीरा खरीद रहे हैं. मांग बनी रहने और कीमत में अपेक्षाकृत स्थिरता के कारण किसानों का रुझान लगातार खीरे की खेती की ओर बढ़ रहा है.
खेती से जुड़े अन्य लोगों की भी बढ़ी आमदनी
बड़े पैमाने पर खीरे की खेती का आर्थिक लाभ किसानों और व्यापारियों के अलावा अन्य वर्गों को भी मिल रहा है. बाहरी व्यापारियों के लिए काम करने वाले कमीशन एजेंट, ट्रांसपोर्टर, मजदूर, लोडर और पैकरों की आमदनी भी खीरे के कारोबार से बढ़ी है. गांवों में खीरे की उपज की खरीद और बाहर भेजे जाने से नकदी का प्रवाह बढ़ा है. किसानों को फसल का भुगतान मिलने के बाद स्थानीय बाजार में उनकी क्रय शक्ति बढ़ रही है. इसका सकारात्मक असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है. कम लागत, कम समय में तैयार होने वाली फसल और लगातार बाजार उपलब्ध रहने के कारण रामगढ़ में खीरे की खेती अब किसानों के लिए केवल वैकल्पिक फसल नहीं, बल्कि आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनती जा रही है.
