बासुकिनाथ. श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान सप्ताह यज्ञ के सातवें दिन बासुकिनाथ रेलवे स्टेशन के समीप कथा पंडाल में भक्तों की भीड़ लगी. कथावाचक मदनमोहन शास्त्री ने सुदामा चरित्र और परीक्षित मोक्ष प्रसंगों का सुंदर वर्णन किया. कृष्ण-सुदामा मिलन का दृश्य देख व प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भाव-विह्वल हो गए. सुदामा जितेंद्रिय एवं भगवान कृष्ण के परम मित्र थे. भिक्षा मांगकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते. गरीबी के बावजूद हमेशा भगवान के ध्यान में मग्न रहते. पत्नी सुशीला सुदामा से बार-बार आग्रह करती कि आपके मित्र तो द्वारकाधीश हैं, उनसे जाकर मिलो. शायद वह हमारी मदद कर दें. सुदामा पत्नी के कहने पर द्वारका पहुंचते हैं और जब द्वारपाल भगवान कृष्ण को बताते हैं कि सुदामा नाम का ब्राह्मण आया है. कृष्ण यह सुनकर नंगे पैर दौड़कर आते हैं और अपने मित्र को गले से लगा लेते हैं. उनकी दीन दशा देखकर कृष्ण के आंखों से अश्रुओं की धारा प्रवाहित होने लगती है. सिंहासन पर बैठाकर कृष्णजी सुदामा के चरण धोते हैं. सभी पटरानियां सुदामा से आशीर्वाद लेती हैं. सुदामा विदा लेकर अपने स्थान लौटते हैं तो भगवान कृष्ण की कृपा से अपने यहां महल बना पाते हैं. लेकिन सुदामा अपनी फूस की बनी कुटिया में रहकर भगवान का सुमिरन करते हैं. अगले प्रसंग में शुकदेव ने राजा परीक्षित को सात दिन तक श्रीमद्भागवत कथा सुनायी, जिससे उनके मन से मृत्यु का भय निकल गया. तक्षक नाग आता है और राजा परीक्षित को डंस लेता है. राजा परीक्षित कथा श्रवण करने के कारण भगवान के परमधाम को पहुंचते हैं. इसी के साथ कथा का विराम हो गया. पंडितजी ने सुंदर समाज निर्माण के लिए गीता से कई उपदेश के माध्यम अपने को उस अनुरूप आचरण करने को कहा. जो काम प्रेम के माध्यम से संभव है, वह हिंसा से संभव नहीं हो सकता है. समाज में कुछ लोग ही अच्छे कर्मों द्वारा सदैव चिर स्मरणीय होते हैं. भागवत कथा के इस आयोजन में यजमान रामानंद झा व उनकी धर्मपत्नी रूबी देवी बनी हैं. कार्यक्रम के सफल आयोजन में भागवत कथा आयोजक समिति के कथा के सफल संचालन में भागवत समिति सदस्य बालानंद झा, रजत, बबलू, शारदानंद झा, सौरभ सहित स्थानीय सभी ग्रामीण तन-मन-धन से लगे हुए हैं.
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