संवाददाता, दुमका: हिंदी दिवस पखवाड़ा के तहत शनिवार को ग्रांट इस्टेट स्थित 'सतीश चौरा' में सतीश स्मृति मंच ट्रस्ट की ओर से 'हिंदी दशा-दिशा' विषय पर विचार गोष्ठी सह कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता वरीय साहित्यकार कमलाकांत प्रसाद सिन्हा ने की. गोष्ठी में हिंदी की वर्तमान स्थिति, उसकी लोकप्रियता, व्याकरण, साहित्य और लोकभाषाओं से उसके संबंध को लेकर वक्ताओं ने अपने विचार रखे.
व्याकरण साहित्य को खूबसूरत बनाता है, लेकिन भाषा को बांधना ठीक नहीं
वरीय साहित्यकार चतुर्भुज नारायण मिश्रा ने हिंदी में व्याकरण की भूमिका पर चर्चा की. उन्होंने कहा कि व्याकरण साहित्य में सुंदरता लाता है. जब साहित्य की रचना इस दृष्टि से की जाती है तो वह बेहतर और प्रभावशाली बनता है.
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि साहित्य को केवल व्याकरण की सीमाओं में बांधकर रखना उचित नहीं है. भाषा के सहज और स्वाभाविक रूप को भी जगह मिलनी चाहिए.
बोलचाल की हिंदी से बढ़ेगी लोकप्रियता
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कमलाकांत प्रसाद सिन्हा ने कहा कि हिंदी को सामान्य बोलचाल की भाषा में लिखने और बोलने से इसकी लोकप्रियता और बढ़ेगी.
उन्होंने सहज भाषा के इस्तेमाल पर जोर देते हुए कहा कि हिंदी जितनी सरल और आम लोगों के करीब होगी, उतनी ही आसानी से लोग उसे अपनाएंगे.
अरुण कुमार सिन्हा ने बच्चों में हिंदी के प्रति रुचि पैदा करने की जरूरत बतायी. उन्होंने बच्चों को हिंदी की पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने के लिए प्रेरित करने पर जोर दिया.
हिंदी के साथ लोकभाषाओं को भी आगे बढ़ाने पर जोर
विद्यापति झा ने कहा कि अखबार, संचार माध्यम और चलचित्र हिंदी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. उन्होंने हिंदी के विकास के साथ-साथ लोकभाषाओं को भी साथ लेकर चलने की जरूरत बतायी.
वहीं केशव सिन्हा ने आज की हिंदी के व्यापक स्वरूप पर चर्चा की और भाषा में लगातार हो रहे बदलावों को लेकर अपने विचार रखे.
कविताओं ने बांधा समां, श्रोता हुए भावुक
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ. इसमें कवियों ने अलग-अलग विषयों पर अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं.
अमित झा ने 'हिंदी को आसमान दें' कविता प्रस्तुत की. विष्णुदेव महतो ने 'मजहब के नाम ना हो कोई लड़ाई' के जरिए कौमी एकता का संदेश दिया.
पवन मिश्रा ने एकाकी जीवन पर केंद्रित कविता 'घर वह होता है जहां रिश्ता जीवित होता है' प्रस्तुत की. वहीं अमरेन्द्र सुमन की कविता 'उपवन सूना हो गया, माली गया विदेश' ने श्रोताओं को भावुक कर दिया.
'हिंदी मां की लोरी है' ने खींचा ध्यान
रोहित अम्बष्ट ने 'हिंदी प्रेम की डोरी है, हिंदी मां की लोरी है' के माध्यम से हिंदी की महत्ता को रेखांकित किया. मनोज घोष ने 'हिंदी भाषाओं का सागर है' कविता प्रस्तुत की.
वहीं दुर्गेश चौधरी ने अपने अप्रकाशित कहानी संग्रह से एक कहानी का पाठ किया.
कार्यक्रम के अंत में मंच के सचिव कुंदन कुमार झा ने धन्यवाद ज्ञापन किया.
एक नजर में
- दुमका में 'हिंदी दशा-दिशा' विषय पर विचार गोष्ठी.
- हिंदी दिवस पखवाड़ा के तहत हुआ आयोजन.
- हिंदी को सरल और बोलचाल की भाषा में अपनाने पर जोर.
- हिंदी के साथ लोकभाषाओं को आगे बढ़ाने की बात.
- कवि सम्मेलन में कवियों ने प्रस्तुत की रचनाएं.
- कौमी एकता और सामाजिक सरोकारों पर भी कविताएं पेश की गयीं.
