जिले में 138 स्मार्ट क्लास बंद, बच्चों के सपने अधूरे,

विशेष रिपोर्ट के अनुसार, दुमका जिले में नीति आयोग और जिला प्रशासन द्वारा डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित 130 स्मार्ट क्लासों में से 87 काम नहीं कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे अब भी पुरानी चॉक-डस्टर पद्धति पर निर्भर हैं। तकनीकी खराबी और देखरेख की कमी के कारण इन क्लासों की स्थिति खराब हो गई है। मुख्य समस्याएं यूपीएस बैटरी, मिनी पीसी और मदरबोर्ड में खराबी हैं। जबकि अन्य एजेंसियों के प्रोजेक्ट अधिक सफल रहे हैं, नीति आयोग का प्रोजेक्ट 67% असफल रहा है। इसके पीछे मेंटेनेंस, टेक्निकल सपोर्ट और निगरानी की कमी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इससे बच्चों को डिजिटल पिछड़ापन और संसाधनों की बर्बादी हो रही है।

विशेष रिपोर्ट: डिजिटल इंडिया के बीच ग्रामीण बच्चे चॉक-डस्टर पर निर्भर नीति आयोग-जिला प्रशासन द्वारा लगाये गये 130 में 87 स्मार्ट क्लास नन फंक्शनल तकनीकी खराबी और देखरेख के अभाव से परियोजना दम तोड़ती नीति आयोग की पहल पर लगाए गए उपकरण कबाड़ में तब्दील आनंद जायसवाल, दुमका. जिले के सरकारी स्कूलों को आधुनिक बनाने और बच्चों को डिजिटल शिक्षा से जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना अब ठहरती हुई नजर आ रही है. 447 स्कूलों में लगाए गए 663 स्मार्ट क्लास उपकरणों में से 138 बंद पड़े हैं. यह स्थिति उन बच्चों के लिए सबसे अधिक निराशाजनक है, जिनके सपनों को तकनीक के सहारे नई दिशा देने का वादा किया गया था. नीति आयोग और जिला प्रशासन की पहल पर अईज़े वर्टीक्स ट्राजेन एजेंसी द्वारा लगाए गए स्मार्ट क्लास उपकरण अब अधिकांश स्कूलों में कबाड़ में तब्दील हो रहे हैं. तकनीकी खराबी और देखरेख के अभाव ने इस परियोजना को कमजोर कर दिया है. स्मार्ट क्लास बंद होने का मुख्य कारण यूपीएस की बैटरी डेड होना, मिनी पीसी में खराबी और मदरबोर्ड की समस्या है. कई स्कूलों में तो एक साल से अधिक समय से सिस्टम चालू नहीं हो सका है. यह विडंबना है कि जहां सरकार डिजिटल इंडिया का नारा दे रही है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे अभी भी पुरानी चॉक-डस्टर पद्धति पर निर्भर हैं. परेशानी: बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ स्मार्ट क्लास बंद होने से छात्रों को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है: प्रायोगिक ज्ञान की कमी: विज्ञान और गणित जैसे कठिन विषयों को विजुअल (Visuals) के जरिए समझना आसान होता है, लेकिन सिस्टम बंद होने से यह संभव नहीं हो पा रहा. डिजिटल पिछड़ापन: निजी स्कूलों के मुकाबले सरकारी स्कूल के बच्चे तकनीक के मामले में पिछड़ रहे हैं. संसाधनों की बर्बादी: लाखों रुपये की लागत से खरीदे गए प्रोजेक्टर, टीवी और कंप्यूटर समय पर रिपेयर न होने के कारण खराब हो रहे हैं. केस स्टडी: कहाँ क्या है स्थिति? डाटा के अनुसार कुछ प्रमुख स्कूलों की स्थिति इस प्रकार है: अपग्रेडेड मिडिल स्कूल बनकाठी (दुमका): यहां पिछले एक साल से बैटरी की समस्या के कारण स्मार्ट क्लास बंद है अपग्रेडेड मिडिल स्कूल चिरूडीह -1: यहाँ एजेंसी का सिस्टम पिछले 6 महीनों से काम नहीं कर रहा है. हाई स्कूल अमजोड़ा (रानीश्वर): यहां मिनी पीसी की खराबी के कारण सिस्टम खुल ही नहीं रहा है. प्रोजेक्ट हाई स्कूल कारूडीह (गोपीकांदर): यहां की स्थिति और भी गंभीर है, जहाँ प्रोजेक्टर, यूपीएस और बैटरी की चोरी हो जाने के कारण शिक्षा बाधित है. राजकीय मिडिल स्कूल कुरमाहाट (सरैयाहाट): यहां रैम और एचडी एमआई केबल की समस्या के कारण महीनों से स्क्रीन पर अंधेरा है. नीति आयोग–जिला प्रशासन प्रोजेक्ट पर सवाल: सबसे ज्यादा स्मार्ट क्लास बंद, आखिर क्यों पिछड़ा यह प्रोजेक्ट? दुमका. जिले में स्मार्ट क्लास की स्थिति ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है. जहां एक ओर अधिकांश एजेंसियों के प्रोजेक्ट बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं नीति आयोग–जिला प्रशासन के तहत संचालित प्रोजेक्ट सबसे खराब स्थिति में पाया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के तहत 130 स्मार्ट क्लास स्थापित किए गए, लेकिन इनमें से केवल 43 कार्यशील हैं, जबकि 87 पूरी तरह बंद पड़े हैं. यानी लगभग 67% स्मार्ट क्लास गैर-कार्यशील हैं, जो जिले में सबसे खराब प्रदर्शन है. तुलना में अन्य एजेंसियां बेहतर अगर अन्य एजेंसियों से तुलना करें, तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है. आदर्श विद्यालय योजना (स्कूलनेट): 119 में 116 कार्यशील (लगभग 97%),आइसीटी (स्कूलनेट): 108 में 105 कार्यशील (97%), टीसीआईएल : 16 में 16 (100%), पावरमैक्स : 44 में 43 (98%) और बीसीसीएल एडिक्यू : 21 में 18 (86%) वहीं, मिलेनियम और हिताची में कुछ समस्याएं जरूर हैं, लेकिन उनकी स्थिति भी नीति प्रोजेक्ट से बेहतर है. सबसे बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन? इतना बड़ा अंतर कई गंभीर सवाल खड़े करता है— जब अन्य एजेंसियां 90–100% तक स्मार्ट क्लास चला पा रही हैं, तो नीति आयोग–जिला प्रशासन का प्रोजेक्ट क्यों फेल हो रहा है? क्या मेंटेनेंस (रखरखाव) की कमी है. टेक्निकल सपोर्ट नहीं मिल रहा. बिजली/इंटरनेट की समस्या ज्यादा है. या फिर निगरानी ही कमजोर है?

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By ANAND JASWAL

ANAND JASWAL is a contributor at Prabhat Khabar.

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