Dr. Ramdayal Munda Jayanti: 23 अगस्त को डॉ रामदयाल मुंडा की जयंती है. संस्कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी, झारखंड आंदोलनकारी, विचारक, लेखक व प्राध्यापक डॉ रामदयाल मुंडा को श्रद्धांजलि दी जाएगी. यहां उनके जीवन से जुड़े तीन व्यक्तियों के संस्मरण प्रस्तुत है.
किसी न किसी रूप में आदिवासी विचारधारा से जुड़े रहे
डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्माता मेघनाथ ने कहा कि 1970 के दशक में डॉ मुंडा ने अमेरिका में पढ़ाई की और अध्यापन का काम किया. उन्होंने उन चीजों को छोड़कर फिर से झारखंड आना और यहां काम करने का फैसला लिया. वे आदिवासी जीवनदर्शन और विचारधारा के साथ जीते थे,पर उनकी स्वीकार्यता सभी वर्गों के बीच थी. वे झारखंड के साथ-साथ नॉर्थ ईस्ट, मध्य भारत और देश के अन्य क्षेत्रों में समान रूप से लोकप्रिय हुए. अपनी बीमारी से पूर्व दिल्ली में आयोजित एक समारोह में उन्होंने उन गैर आदिवासियों को सम्मानित किया था जो किसी न किसी रूप में आदिवासी विचारधारा के लिए काम कर रहे थे. मुझे याद है उन्होंने रमणिका गुप्ता, अर्थशास्त्री डॉ रमेश शरण और डॉ बीडी शर्मा जैसे व्यक्तियों को सम्मानित किया.
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जर्मनी में गृहस्वामी ने डॉ मुंडा से सीखा सबक
प्रो संजय बसु मलिक ने कहा कि झारखंड आंदोलन में डॉ मुंडा के साथ रहे और उनके बौद्धिक और रचनात्मक कार्यों के प्रत्यक्षदर्शी भी हैं. उन्होंने कहा कि 1994 में डॉ मुंडा के साथ जर्मनी व यूरोप के अलग-अलग देशों में जाने का अवसर मिला. हमें यूरोपीय देशों से ही आमंत्रण मिला था कि आदिवासी जीवन दर्शन के बारे में कुछ बताएं. जर्मनी में जिस घर में हम ठहरे वहां एक रात भोजन के बाद सोने से पूर्व डॉ मुंडा ने घर की सारी बत्तियां बुझा दीं. आमतौर पर वहां रात में भी बत्तियां जली रहती हैं. सुबह गृहस्वामी ने कहा कि आपने मुझे गहरा सबक दिया है, अब मैं भी रात में सोने से पहले बत्तियां बुझाया करूंगा. डॉ मुंडा ने कहा कि हमारे यहां सोने से पूर्व बत्तियां बुझाना आम बात है. उन्होंने कहा कि बिजली बनाने में कोयला जलता है, जंगल कटते हैं और नदियां प्रदूषित होती हैं. इसलिए जब जरूरत न हो तो बत्तियां बुझा देना चाहिए ताकि बचत हो.
अमेरिका ने उनकी बौद्धिकता को निखारा
डॉ रामदयाल मुंडा के बैटे गुंजल इकिर मुंडा ने कहा कि कुछ साल पहले मुझे पिताजी की जीवनी पर आधारित डॉक्यूमेंटरी के सिलसिले में अमेरिका में मिनेसोटा यूनिवर्सिटी और उन स्थानों का दौरा करने का मौका मिला जहां उन्होंने काम किया था. वहां ऐसा माहौल था जहां कोई भी अच्छा विद्यार्थी जाकर सर्वश्रेष्ठ होकर ही निकलेगा. मैंने उनके गुरु डॉ नॉर्मन जाइड से मुलाकात की और उन लोगों से मिला जिनके साथ उन्होंने काम किया. उनके व्यक्तित्व ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी और उनकी प्रेरणा से मेरे जीवन को दिशा मिली. उन्होंने कभी मुझ पर अपनी इच्छाएं नहीं थोपी कि मुझे क्या करना चाहिए, बल्कि उनकी वजह से मुझे अपने जीवन की दिशा निर्धारित करने में मदद मिली.
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