झारखंड में हर ग्रामीण परिवार तक नल से पानी पहुंचाने के लिए चल रहे जल जीवन मिशन की जमीनी स्थिति पर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की वर्ष 2026 की प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट ने गंभीर सवाल उठाये हैं. रिपोर्ट के अनुसार, नल कनेक्शन तो बढ़े, पर जिन कनेक्शनों में वास्तविक पानी की आपूर्ति की जांच की गयी, वहां निर्धारित जरूरत का सिर्फ 37 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध हो रहा था.
20 योजनाओं के 983 कनेक्शनों की जांच में खुलासा
कैग ने राज्य के पांच प्रमंडलों की 40 एकल ग्राम योजनाओं की जांच की. इनमें 20 योजनाओं से जुड़े 983 नल कनेक्शनों की पानी आपूर्ति का आकलन किया गया.
इन कनेक्शनों के लिए हर महीने 81.10 लाख लीटर पानी की जरूरत थी, जबकि वास्तविक जांच में सिर्फ 29.89 लाख लीटर पानी का प्रवाह मिला. यानी जरूरत के मुकाबले 51.21 लाख लीटर पानी कम मिला. जल जीवन मिशन के तहत प्रत्येक ग्रामीण व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम 55 लीटर पानी उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित है.
52.27 लाख परिवारों में सिर्फ सात प्रतिशत से बढ़कर 55 प्रतिशत तक पहुंचा कनेक्शन
राज्य में नल कनेक्शन का दायरा पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा. अगस्त 2019 में झारखंड में कुल 52,27,214 ग्रामीण परिवार थे. इनमें सिर्फ 3,45,165 परिवारों यानी सात प्रतिशत के पास नल कनेक्शन था. मार्च 2025 तक ग्रामीण परिवारों की संख्या बढ़कर 62,53,471 हो गयी.
इनमें 34,31,115 परिवारों यानी 55 प्रतिशत को कनेक्शन दिया जा चुका था. हालांकि, कैग की रिपोर्ट बताती है कि कनेक्शन का विस्तार और पर्याप्त मात्रा में पानी की आपूर्ति अलग-अलग बातें हैं. मार्च 2025 तक राज्य के 29,398 गांवों में सिर्फ 6,439 गांव ऐसे थे, जहां सभी परिवारों को नल कनेक्शन मिल पाया था. दूसरी ओर 6,958 गांव ऐसे थे, जहां एक भी परिवार को नल कनेक्शन नहीं मिला था.
98,067 योजनाओं में सिर्फ 27,249 पूरी
जल जीवन मिशन की योजनाओं की प्रगति भी कैग की जांच में सवालों के घेरे में रही. जनवरी 2020 से फरवरी 2023 के बीच राज्य जल एवं स्वच्छता मिशन ने 24,360.91 करोड़ रु की अनुमानित लागत से 98,067 योजनाओं को मंजूरी दी थी.
इनमें 97,535 योजनाओं को 24,665.29 करोड़ रु की अनुबंधित लागत पर काम के लिए लिया गया. दिसंबर 2024 तक सिर्फ 27,249 योजनाएं यानी 28 प्रतिशत पूरी हो सकीं. 70,286 योजनाएं अधूरी थीं. इनमें 35,783 योजनाएं दो साल से अधिक समय से लंबित थीं. यानी स्वीकृत योजनाओं की बड़ी संख्या तय अवधि तक पूरी नहीं हो सकी.
थर्ड पार्टी जांच से पहले ही 1,578.25 करोड़ रु खर्च
काम की गुणवत्ता जांच में भी बड़ी कमी सामने आयी. नियमों के अनुसार भुगतान से पहले तीसरे पक्ष की निरीक्षण एजेंसी से काम की गुणवत्ता की जांच और प्रमाणन जरूरी था. राज्य में ऐसी चार एजेंसियां जुलाई 2022 में नियुक्त की गयीं, पर मार्च 2022 तक योजनाओं पर 1,578.25 करोड़ रु खर्च हो चुके थे.
दरअसल इन कार्यों का अनिवार्य तीसरे पक्ष से निरीक्षण और प्रमाणन नहीं कराया गया था. कैग को दो प्रमंडलों में आठ कार्यों से जुड़े 64.86 करोड़ रुपये के काम में घटिया स्टील और पाइप के इस्तेमाल तथा कमजोर संरचनात्मक कार्य जैसी कमियां भी मिलीं.
35 तरह के उपकरण जरूरी, लैब में सिर्फ आठ से 16 प्रकार उपलब्ध
जल गुणवत्ता जांच की प्रयोगशाला व्यवस्था में भी संसाधनों की कमी मिली. निर्धारित 35 प्रकार के उपकरणों के मुकाबले जांची गयी प्रयोगशालाओं में सिर्फ आठ से 16 प्रकार के उपकरण उपलब्ध थे. कर्मचारियों की संख्या भी मानक के अनुरूप नहीं थी.
आठ कर्मचारियों की निर्धारित संख्या के मुकाबले 2019-24 के दौरान जांची गयी प्रयोगशालाओं में सिर्फ तीन-सात कर्मचारी उपलब्ध रहे. 2022-24 के दौरान पांच प्रयोगशालाओं में 37,928 जीवाणु संबंधी जांचें दर्ज की गयीं, पर इस अवधि में किसी भी प्रयोगशाला में सूक्ष्मजीव विज्ञानी या जीवाणु विज्ञानी उपलब्ध नहीं था.
धनबाद में 13 में से सिर्फ 7 जल गुणवत्ता मानकों की मान्यता
धनबाद जिला प्रयोगशाला को मार्च 2020 में सात मानकों के लिए मान्यता मिली थी. अक्तूबर 2022 में भी सात मानकों पर ही नयी मान्यता मिली. जबकि जल जीवन मिशन के तहत 13 बुनियादी जल गुणवत्ता मानकों की जांच जरूरी थी.
धनबाद जिला प्रयोगशाला ने 28,800 के लक्ष्य के मुकाबले 25,080 जांचें पूरी कीं. यह लक्ष्य का करीब 87 प्रतिशत है. यानी जांच की संख्या लक्ष्य के काफी करीब रही, पर जांच के दायरे में सभी जरूरी जल गुणवत्ता मानक शामिल नहीं थे.
जल गुणवत्ता निगरानी के लिए मिले 197.25 करोड़, खर्च सिर्फ 50.58 करोड़
2019-24 के दौरान केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन के लिए 5,917.46 करोड़ रु जारी किये. सहायक गतिविधियों के लिए उपलब्ध 493.12 करोड़ रु में सिर्फ 83.35 करोड़ रु खर्च हुए. यह उपलब्ध राशि का करीब 16.90 प्रतिशत था.
वहीं जल गुणवत्ता निगरानी के लिए उपलब्ध 197.25 करोड़ रु में केवल 50.58 करोड़ रु खर्च किये गये, जो करीब 25.64 प्रतिशत है. इससे जल गुणवत्ता की निगरानी के लिए उपलब्ध राशि के कम इस्तेमाल की स्थिति सामने आयी.
गांवों में फील्ड जांच किट भी पर्याप्त नहीं पहुंचीं
ग्रामीण स्तर पर पानी की जांच के लिए फील्ड जांच किट भी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं करायी गयीं. 2021-23 के दौरान जिन जिलों की जांच की गयी, उनमें केवल 15 से 45 प्रतिशत गांवों तक ही ये किट पहुंचे. इसका मतलब यह रहा कि बड़ी संख्या में गांवों में स्थानीय स्तर पर पानी की गुणवत्ता की जांच के लिए आवश्यक किट उपलब्ध नहीं थे.
नल लगने के बाद पानी की मात्रा और गुणवत्ता दोनों पर सवाल
कैग की जांच में सामने आये आंकड़ों के अनुसार जल जीवन मिशन में केवल नल कनेक्शन का विस्तार ही पर्याप्त नहीं है. 983 कनेक्शनों की वास्तविक जांच में निर्धारित 81.10 लाख लीटर मासिक जरूरत के मुकाबले 29.89 लाख लीटर पानी का प्रवाह मिला.
वहीं 98,067 स्वीकृत योजनाओं में दिसंबर 2024 तक सिर्फ 27,249 योजनाएं पूरी हो सकीं. दूसरी ओर जल गुणवत्ता जांच के लिए प्रयोगशालाओं में उपकरण और विशेषज्ञों की कमी, धनबाद में 13 जरूरी मानकों के मुकाबले सात मानकों की मान्यता, निगरानी के लिए उपलब्ध राशि का कम खर्च और गांवों में फील्ड जांच किट की सीमित उपलब्धता भी सामने आयी.
रिपोर्ट के आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि ग्रामीण परिवारों तक नल पहुंचाने के साथ निर्धारित मात्रा में पानी और उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी बड़ी चुनौती बनी हुई है.
