धनबाद से सुधीर सिन्हा की रिपोर्ट
Tax Evasion: झारखंड में टैक्स चोरी का एक बड़ा और संगठित मामला सामने आया है. स्टेट टैक्स डिपार्टमेंट (जीएसटी) की जांच में खुलासा हुआ है कि 10 फर्जी (शेल) कंपनियों के नाम पर ई-वे बिल (परमिट) जनरेट कर 330.54 करोड़ रुपये मूल्य का कोयला, लोहा और सीमेंट अवैध तरीके से बेचा गया. इस पूरे खेल के जरिए इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) का गलत इस्तेमाल कर करीब 61.89 करोड़ रुपये का जीएसटी हड़प लिया गया. जांच रिपोर्ट के अनुसार, यह घोटाला पिछले सात महीनों से लगातार चल रहा था.
रिटर्न नहीं भरने पर हुआ डाउट
स्टेट टैक्स डिपार्टमेंट के अफसरों के अनुसार, नियम के तहत माल की बिक्री के बाद जीएसटीआर-3बी रिटर्न दाखिल करना जरूरी होता है. लेकिन, जब संबंधित कंपनियों ने समय पर रिटर्न फाइल नहीं किया, तो डिपार्टमेंट को डाउट हुआ. इसके बाद जब पोर्टल के जरिए ट्रांजैक्शन डेटा की गहराई से जांच की गई, तो एक-एक करके कई शेल कंपनियों की परतें खुलती चली गईं.
ई-वे बिल के सहारे चला अवैध कारोबार
जांच में सामने आया कि इन 10 फर्जी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर ई-वे बिल जनरेट किए. इन्हीं ई-वे बिलों के सहारे कोयला, लोहा और सीमेंट की अवैध ढुलाई और कागजी खरीद-बिक्री दिखाई गई. असल में या तो माल काले बाजार से आया था या फिर बिना टैक्स चुकाए बेचा गया, लेकिन कागजों में सब कुछ वैध दिखाया गया.
आईटीसी एडजस्ट कर उड़ाया 61 करोड़ का टैक्स
फर्जी लेनदेन दिखाकर कंपनियों ने इनपुट टैक्स क्रेडिट का बेनिफिट लिया और बिक्री पर पेबेल जीएसटी को आईटीसी से एडजस्ट कर दिया. इस तरह सरकार को मिलने वाला टैक्स कभी जमा ही नहीं किया गया. डिपार्टमेंटल रिपोर्ट के अनुसार, कुल 330 करोड़ रुपये के कारोबार पर करीब 61 करोड़ रुपये की टैक्स चोरी की गई.
जांच के बाद लगाई गई भारी पैनल्टी
स्टेट के टैक्स डिपार्टमेंट ने जांच में टैक्स चोरी साबित होने के बाद इन शेल कंपनियों पर माल मूल्य के अनुसार जीएसटी के साथ भारी जुर्माना लगाया है. अधिकारियों ने बताया कि कोयले पर 5%, सीमेंट पर 28% और लोहे पर 18% जीएसटी के हिसाब से टैक्स और पेनल्टी लगाई गई है. साथ ही, इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है.
माल खरीदने वाली कंपनियों को भी नोटिस
केवल शेल कंपनियों पर ही नहीं, बल्कि जिन कंपनियों ने इनसे माल खरीदा, उन्हें भी अलर्ट नोटिस जारी किया गया है. डिपार्टमेंट का कहना है कि जिन खरीदार कंपनियों ने फर्जी ई-वे बिल के आधार पर माल लिया और आईटीसी का बेनिफिट उठाया, उनसे भी टैक्स वसूली की जाएगी. जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस नेटवर्क में और कितनी वास्तविक कंपनियां शामिल थीं.
कागजों में चल रहा था दफ्तर
जब स्टेट के टैक्स डिपार्टमेंट की टीम ने इन कंपनियों के पते पर जाकर फिजिकल वेरिफिकेशन किया, तो बड़ा खुलासा हुआ. जहां कंपनियों का ऑफिस दिखाया गया था, वहां केवल परती जमीन मिली. 10 में से छह कंपनियों ने धनबाद-नागरीय अंचल और चार ने झरिया अंचल का पता दर्ज कराया था. इनमें से दो कंपनियां सेंट्रल जीएसटी में भी रजिस्टर्ड पाई गईं. इससे यह साफ हुआ कि पूरा नेटवर्क सुनियोजित तरीके से खड़ा किया गया था.
कैसे चलता है शेल कंपनियों का खेल
जांच अधिकारियों के अनुसार, शेल कंपनियां आमतौर पर फर्जी रेंट एग्रीमेंट, पैन कार्ड और आधार जैसे दस्तावेजों के सहारे ऑनलाइन जीएसटी रजिस्ट्रेशन कराती हैं. इसके बाद खदानों से निकलने वाले दो नंबर के कोयले को एक नंबर बनाने के लिए इन कंपनियों के नाम पर ई-वे बिल जनरेट किए जाते हैं.इन्हीं परमिटों के जरिए कोयला या तो राज्य के बाहर भेज दिया जाता है या फिर स्थानीय ईंट-भट्ठों और उद्योगों में खपा दिया जाता है. लोहा और सीमेंट का कारोबार अक्सर केवल कागजों में दिखाया जाता है, ताकि आईटीसी का लाभ उठाया जा सके.
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टैक्स डिपार्टमेंट की सख्ती से मचा हड़कंप
इस खुलासे के बाद कोयला, लोहा और सीमेंट कारोबार से जुड़े लोगों में हड़कंप मच गया है. टैक्स डिपार्टमेंट ने साफ संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में ई-वे बिल, आईटीसी और रिटर्न फाइलिंग से जुड़े मामलों पर और कड़ी निगरानी होगी. डिपार्टमेंटल सोर्स का कहना है कि यह कार्रवाई केवल शुरुआत है और आने वाले समय में और बड़े खुलासे हो सकते हैं.
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