ऑपरेशन सिंदूर स्वदेशी रक्षा तकनीक की ताकत की मिसाल है : संजय सेठ

रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर स्वदेशी रक्षा तकनीक की मिसाल है। भारत अब 102 देशों को रक्षा सामग्री का निर्यात कर रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर स्वदेशी रक्षा तकनीक की ताकत का उदाहरण है. भारत ने पहले जिन युद्धों में विदेशी हथियारों पर निर्भरता देखी, उसके विपरीत ऑपरेशन सिंदूर में स्वदेशी रक्षा प्रणालियों का प्रभावी इस्तेमाल किया गया. इसने दुनिया का ध्यान भारत की तकनीकी और रक्षा क्षमता की ओर आकर्षित किया. यह कहना है रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ का. वह शनिवार को आइआइटी आइएसएम धनबाद में इंडियन नेशनल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग (आइएनएइ) के सहयोग से आयोजित 20वें नेशनल फ्रंटियर्स ऑफ इंजीनियरिंग (NaTFoE-2026) संगोष्ठी एवं इनोवेशन इन मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज (IMP-2026) के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे.

नयी तकनीक और स्वदेशी समाधान पर बल

रक्षा राज्य मंत्री श्री सेठ ने कहा कि आने वाला समय इनोवेशन और स्वदेशी तकनीक का है. दुनिया में तकनीक हर घंटे बदल रही है और अगर हम बदलाव का इंतजार करते रहे, तो बहुत देर हो जायेगी. देश को अगले 100 वर्षों की जरूरतों के मद्देनजर आज से ही नयी तकनीक और स्वदेशी समाधान विकसित करने होंगे. इसके लिए शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को प्रयोगशालाओं से निकलकर ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी, जिसका सीधा लाभ देश और समाज को मिले.


सौ साल की उपलब्धियां मील का पत्थर हैं

श्री सेठ ने कहा कि 100 वर्ष किसी संस्थान के लिए सामान्य उपलब्धि नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण माइलस्टोन है. अब पीछे मुड़कर यह देखने के बजाय कि पिछले 100 वर्षों में क्या किया गया, अगले 100 वर्षों में क्या करना है, इस पर ध्यान देने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि 2047 में जब भारत आजादी के 100 वर्ष पूरे करेगा, तब देश कैसा होगा, इसकी नींव आज के युवा तैयार करेंगे.

13 सालों में आयातक से बड़ा निर्यातक

उन्होंने रक्षा क्षेत्र में भारत की बदलती स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ वर्ष पहले तक भारत रक्षा उपकरणों का बड़ा आयातक था. वर्ष 2013 में देश का रक्षा निर्यात केवल 646 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये हो गया है. आज भारत 102 देशों को रक्षा सामग्री निर्यात कर रहा है. देश का रक्षा उत्पादन पिछले वर्ष करीब 1.78 लाख करोड़ रुपये रहा और 2029 तक इसे तीन लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य है.

एआइ से खतरा नहीं

उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को रोजगार के लिए खतरे के रूप में देखने की जरूरत नहीं है. एआइ का इस्तेमाल किसानों, स्वास्थ्य, रक्षा और अन्य क्षेत्रों में नयी सुविधाएं विकसित करने के लिए किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि भारत के युवा और स्टार्टअप दुनिया में किसी से पीछे नहीं हैं. देश में युवाओं को प्रोटोटाइप और रक्षा तकनीक विकसित करने के लिए आइडेक्स जैसी योजनाओं के माध्यम से वित्तीय सहायता दी जा रही है.

माइनिंग से आगे बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग पर जोर

रक्षा राज्य मंत्री ने कहा कि पिछले 25 वर्षों में माइनिंग पर काफी काम हुआ, पर अब केवल खनन तक सीमित रहने के बजाय मैन्युफैक्चरिंग और बाय-प्रोडक्ट पर ध्यान देना होगा. उन्होंने कहा कि खदानों में लाखों क्यूबिक मीटर पानी मौजूद है. इस पानी का उपयोग सिंचाई, पेयजल और मत्स्य पालन के लिए कैसे किया जा सकता है, इस पर शोध होना चाहिए. इससे झारखंड में कृषि और मत्स्य पालन के क्षेत्र में बड़ी क्रांति आ सकती है.


आज का युवा समाज और देश की सोच रहा

उन्होंने युवाओं से कहा कि आज का युवा केवल नौकरी और वेतन के बारे में नहीं सोचता, बल्कि यह भी देखता है कि उसने समाज और देश को क्या दिया. उन्होंने विद्यार्थियों को भारत का ब्रांड एंबेसडर बताते हुए कहा कि 2047 के विकसित भारत के निर्माण में उनकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

बदलाव के साथ चलना जरूरी

अशोक पांडाकार्यक्रम में सेल के चेयरमैन अशोक पांडा ने कहा कि बदलते कारोबारी माहौल के अनुरूप खुद को ढालना ही किसी संस्थान और कंपनी की सफलता की कुंजी है. कंपनियों में पुरानी और नयी पीढ़ी के विचारों का समन्वय जरूरी है. जो कंपनियां समय के साथ बदलाव को स्वीकार करती हैं, वही आगे बढ़ती हैं. उन्होंने कहा कि आइआइटी आइएसएम और सेल के बीच वर्षों से मजबूत संबंध रहा है. सेल में आइआइटी आइएसएम के पूर्व छात्र बड़ी संख्या में कार्यरत हैं. पहले संस्थान से मुख्य रूप से माइनिंग और उससे जुड़े क्षेत्रों के विद्यार्थियों का चयन होता था, लेकिन अब अन्य विषयों के विद्यार्थियों के लिए भी अवसर बढ़ाने की जरूरत है.

भारत तीसरी आर्थिक ताकत बनने की ओर

श्री पांडा ने कहा कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है. इसके बाद दूसरे और पहले स्थान तक पहुंचने के लिए बड़ी छलांग की जरूरत होगी. इसके लिए आत्मनिर्भर तकनीक, नवाचार और अपनी क्षमताओं का विकास करना होगा. उन्होंने कहा कि भारत को स्टील, महत्वपूर्ण खनिज, माइनिंग और मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में चीन से मौजूद अंतर को कम करना होगा. देश को विदेशी तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय अपनी तकनीक विकसित करनी होगी. उन्होंने केवल जीडीपी नहीं, बल्कि जीएनपी बढ़ाने पर भी जोर दिया.

विशेषज्ञता के साथ एआइ के इस्तेमाल में भविष्य : संघमित्रा

भारतीय राष्ट्रीय इंजीनियरिंग अकादमी (आइएनएइ) की फेलो संघमित्रा बंद्योपाध्याय ने कहा कि भविष्य उन्हीं विशेषज्ञों का है, जो अपने क्षेत्र की विशेषज्ञता के साथ एआइ का इस्तेमाल करना जानते हों. उन्होंने विद्यार्थियों से आइएनएइ परिवार का हिस्सा बनने का लक्ष्य रखने की अपील की. उन्होंने कहा कि इंजीनियरिंग और शोध का उद्देश्य केवल महत्वपूर्ण सिद्धांतों का समाधान करना नहीं, बल्कि देश की वास्तविक समस्याओं का समाधान तलाशना होना चाहिए.

एआइ की प्रगति के साथ मानव गरिमा की चिंता

उन्होंने एआइ और मशीन लर्निंग के साथ कम्प्यूटेशनल बायोलॉजी जैसे बहुविषयी शोध की संभावनाओं का उल्लेख किया. आइआइटी की माइनिंग विशेषज्ञता को एआइ से जोड़ते हुए उन्होंने खदानों में मौजूद जीवन-रूपों के विश्लेषण जैसे शोध की संभावना बतायी. उन्होंने भारतीय डेटा के अपने डेटाबेस तैयार करने और शोध परियोजनाओं से उत्पन्न डेटा को सुरक्षित तरीके से संरक्षित कर दूसरे शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध कराने की जरूरत बतायी. उन्होंने कहा कि एआइ की तेज प्रगति के बीच मानव गरिमा की रक्षा करना भी जरूरी है. इसके लिए तकनीक के विकास के साथ नैतिक मानकों और सुरक्षा व्यवस्था के मजबूत ‘गार्डरेल्स’ तैयार करने होंगे.

इनोवेशन से ही आगे बढ़ेगा देश

जेडी पाटिलबतौर प्रथम वक्ता एलएंडटी के जेडी पाटिल ने उन्नत विनिर्माण, महत्वपूर्ण धातुओं और नयी प्रक्रिया तकनीकों की बढ़ती जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि बदलती तकनीकी दुनिया में उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच मजबूत सहयोग जरूरी है. शोध और उद्योग की जरूरतों को जोड़कर ही देश में स्वदेशी तकनीक और उन्नत विनिर्माण क्षमता विकसित की जा सकती है.

इससे पहले संस्थान के निदेशक प्रो सुकुमार मिश्रा ने अतिथियों, विशेषज्ञों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों का स्वागत किया. उन्होंने संस्थान की 100 वर्षों की यात्रा और बदलते तकनीकी परिदृश्य में आइआइटी आइएसएम की भूमिका पर प्रकाश डाला. कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ, शिक्षाविद, शोधकर्ता, विद्यार्थी और अन्य प्रतिभागी मौजूद थे.


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By Umanath lal das

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