एक समय धनबाद के पीके राय मेमोरियल कॉलेज में पीजी की पढ़ाई करने वाला छात्र कैसे माओवादी संगठन की शीर्ष कमान तक पहुंच गया. इस बात का खुलासा धनबाद पुलिस की पूछताछ में हुआ. यह कहानी है मिसिर बेसरा की. जिसपर 175 से अधिक मामले दर्ज थे और 2 करोड़ से अधिक रुपये का इनाम रखा गया था.
1990 के दशक में बेसरा ने संगठन का रास्ता अपनाया
पुलिस के अनुसार करीब चार दशक तक माओवादी गतिविधियों में सक्रिय रहे मिसिर बेसरा ने 1990 के दशक में संगठन का रास्ता अपनाया और धीरे-धीरे माओवादी संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका तक पहुंच गया.
पुलिस की पूछताछ में सामने आई जानकारी के मुताबिक, मिसिर बेसरा का जुड़ाव शुरुआती दौर में महाजनी प्रथा और सामंती व्यवस्था के खिलाफ आंदोलनों से हुआ. धनबाद में पढ़ाई के दौरान वह क्रांतिकारी छात्र मोर्चा से जुड़ा. इसके बाद उसका संपर्क माओवादी संगठन से बढ़ता गया और वह संगठन की गतिविधियों में सक्रिय होता चला गया.
पुलिस के मुताबिक, समय के साथ मिसिर ने झारखंड के अलावा बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ तक अपना प्रभाव बढ़ाया, सुरक्षा एजेंसियां उस पर लंबे समय से नजर रख रही थीं. उसके खिलाफ 175 मामले दर्ज होने की बात पुलिस ने कही है. झारखंड में उस पर एक करोड़ और ओडिशा में 1.20 करोड़ रुपये का इनाम घोषित होने की जानकारी भी सामने आई है.
क्या है मिसिर बेसरा की गिरफ्तरी की कहानी ?
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. वह सितंबर 2007 में खूंटी से गिरफ्तार हुआ था. पुलिस के अनुसार 2009 में लखीसराय कोर्ट पर माओवादी हमले के दौरान उसे छुड़ा लिया गया. इसके बाद वह बूढ़ा पहाड़, कोल्हान और सारंडा जैसे इलाकों में सक्रिय रहा.
28 जुलाई 2026 को बरवाअड्डा थाना क्षेत्र के बेंहचिया गांव के पास पुलिस ने पांच संदिग्ध माओवादियों को पकड़ा. पुलिस के मुताबिक उनके पास से तीन AK-47, आठ मैगजीन और 288 गोलियां बरामद हुईं. मामले में मिसिर बेसरा, मोछू उर्फ विभीषण, बीरेन हासदा उर्फ गौरव समेत पांच लोगों के खिलाफ UAPA, CLA, आर्म्स एक्ट और BNS की धाराओं में केस दर्ज किया गया.
पूछताछ में हथियार और पुरानी घटनाओं से जुड़ी कई अहम जानकारियां मिलीं
29 जुलाई को आरोपियों को जेल भेजा गया. इसके अगले दिन मिसिर बेसरा, मोछू और बीरेन हासदा को पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान रांची में राज्य और केंद्र की विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों ने उनसे पूछताछ की.
पुलिस के मुताबिक, पूछताछ में तीनों से माओवादी संगठन की गतिविधियों, पुराने मामलों और हथियारों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलीं. हालांकि, स्वीकारोक्ति बयान में लगाए गए आरोपों का अंतिम सत्यापन और न्यायिक परीक्षण अदालत की प्रक्रिया का हिस्सा होगा.
44 दिन की रिमांड मांगी गई थी
44 दिन की रिमांड मांगी गई थी, लेकिन अवधि पूरी होने से पहले ही 12 अगस्त को पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश कर दिया. अदालत ने उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया.
इस तरह मिसिर बेसरा की कहानी फिलहाल जंगल से जेल तक पहुंच गई है. एक ऐसा सफर जिसकी शुरुआत कॉलेज और छात्र आंदोलन से हुई और जो उसे माओवादी संगठन की शीर्ष कमान तक ले गया.
