कैलेंडर की तस्वीर से शुरू हुई डिगवाडीह की गणेश पूजा, आज बन चुकी है कोयलांचल की बड़ी पहचान

डिगवाडीह की गणेश पूजा का सफर एक कैलेंडर की तस्वीर से शुरू हुआ था. जानिए कैसे आस्था और समर्पण ने इसे कोयलांचल के सबसे बड़े उत्सवों में से एक बना दिया.

धनबाद. डिगवाडीह 10 नंबर का गणेश पूजा मैदान कोयलांचल के बड़े उत्सवों में शामिल गणेश महोत्सव का गवाह बनता है. भव्य पंडाल, विशाल गणेश प्रतिमा, मेला और श्रद्धालुओं की भीड़ इस आयोजन की पहचान बन चुके हैं. लेकिन इस भव्य आयोजन की शुरुआत न तो विशाल प्रतिमा से हुई थी और न ही आकर्षक पंडाल से. इसकी पहली शुरुआत भगवान गणेश की एक कैलेंडर वाली तस्वीर से हुई थी.

पंडाल में स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा

यह कहानी आस्था, संकल्प और एक व्यक्ति के समर्पण की है. स्थानीय लोगों के अनुसार, डिगवाडीह निवासी मुकेश अग्रवाल ने करीब चार दशक पहले जिस छोटी-सी पूजा की शुरुआत की थी, वही आज बड़े गणेश उत्सव का रूप ले चुकी है.

जब मैदान में लगता था सर्कस

जिस मैदान में आज गणेश पूजा के दौरान रौनक रहती है, वहां कभी सर्कस लगा करता था. सर्कस देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे. स्थानीय लोगों के अनुसार, इसी दौरान सर्कस कंपनी के साथ आया एक हाथी मर गया था. बाद में उसे इसी मैदान में दफनाया गया.

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कहा जाता है कि इस घटना के कुछ समय बाद क्षेत्र निवासी मुकेश अग्रवाल को स्वप्न में भगवान श्री गणेश के दर्शन हुए. स्थानीय मान्यता के अनुसार, स्वप्न में उन्हें इसी स्थान पर गणपति की स्थापना करने का संदेश मिला.

मुकेश अग्रवाल ने इस स्वप्न को आस्था से जोड़ा और गणेश पूजा शुरू करने का संकल्प लिया.

न मूर्ति थी, न भव्य पंडाल, कैलेंडर की तस्वीर से हुई पूजा

गणेश चतुर्थी के मौके पर जब पूजा शुरू करने का समय आया, तब न बड़ी प्रतिमा थी और न ही भव्य पंडाल की व्यवस्था. ऐसे में मुकेश अग्रवाल ने अपने घर में रखे भगवान गणेश के कैलेंडर चित्र को ही मैदान में स्थापित किया और विधि-विधान से पूजा की.

न ढोल-नगाड़े थे, न लाउडस्पीकर. कुछ लोगों की मौजूदगी में शुरू हुई यह छोटी-सी पूजा ही आगे चलकर डिगवाडीह गणेश पूजा की नींव बनी.

एक से दो, फिर जुड़ता गया पूरा कारवां

अगले वर्ष इस पूजा से दो और लोग जुड़े. इसके बाद धीरे-धीरे श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गयी. स्थानीय लोगों का जुड़ाव बढ़ा तो कैलेंडर की तस्वीर की जगह गणेश प्रतिमा ने ले ली और छोटे से मंडप का आकार भी धीरे-धीरे बड़ा होता गया.

समय के साथ पूजा का स्वरूप भी विस्तृत होता गया. जो आयोजन कभी कुछ लोगों तक सीमित था, वह पूरे डिगवाडीह और फिर झरिया की पहचान बन गया.

37 वर्ष पूरे कर 38वें वर्ष में पहुंचा आयोजन

आयोजकों के अनुसार, वर्ष 2025 में डिगवाडीह गणेश महोत्सव ने 37 वर्ष पूरे किये और 38वें वर्ष में प्रवेश किया. आज इस आयोजन में झारखंड के अलावा बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब और दिल्ली समेत विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालुओं के पहुंचने का दावा किया जाता है.

गणेश पूजा के दौरान मैदान में विशाल मेला भी लगता है. आकर्षक पंडाल और प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहते हैं.

भव्यता के पीछे उस पहली पूजा की याद

आज डिगवाडीह के गणेश पूजा मैदान में भव्य पंडाल और हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी दिखाई देती है. समय के साथ आयोजन का स्वरूप भले ही बदल गया, लेकिन इसकी शुरुआत की कहानी आज भी लोगों को उस दौर की याद दिलाती है, जब सीमित संसाधनों के बीच केवल आस्था के भरोसे पूजा शुरू हुई थी.

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इस आयोजन की कहानी यही बताती है कि किसी बड़े आयोजन की नींव हमेशा भव्य संसाधनों से नहीं पड़ती. कई बार छोटी-सी पहल, निरंतर प्रयास और लोगों की आस्था मिलकर उसे परंपरा में बदल देती है.

डिगवाडीह गणेश पूजा की इस यात्रा में मुकेश अग्रवाल का नाम उस व्यक्ति के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने कैलेंडर पर बनी गणेश जी की तस्वीर से पूजा की शुरुआत की थी. आज वही पहल कई दशकों की आस्था और परंपरा का रूप ले चुकी है.

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By Umesh singh

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