बीसीसीएल की 141.50 एकड़ जमीन पर खनन विवाद खत्म, सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार को बड़ा झटका देते हुए बीसीसीएल की 141.50 एकड़ जमीन पर खनन रोकने के मामले में दायर याचिका खारिज कर दी है. जामाडीह मौजा में 16 साल से चल रहा कानूनी विवाद अब समाप्त हो गया है.

वन भूमि बताकर बीसीसीएल की 141.50 एकड़ जमीन पर खनन रोकने के मामले में झारखंड सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाइकोर्ट के नवंबर 2024 के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की ओर से दायर याचिका खारिज कर दी है. न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिका में कोई मेरिट नहीं है. इसके साथ ही जामाडीह मौजा की जमीन पर खनन को लेकर करीब 16 वर्षों से चल रहा कानूनी विवाद सुप्रीम कोर्ट में समाप्त हो गया और बीसीसीएल को राहत मिली है.

हाइकोर्ट के फैसले को दी गयी थी चुनौती

मामला धनबाद के लोदना एरिया के जामाडीह मौजा स्थित 141.50 एकड़ जमीन से जुड़ा है. राज्य सरकार ने इस जमीन को संरक्षित वन क्षेत्र बताते हुए बीसीसीएल को यहां खनन बंद करने का निर्देश दिया था. इसके खिलाफ बीसीसीएल ने झारखंड हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. हाइकोर्ट ने नवंबर 2024 में राज्य सरकार के दोनों आदेशों को रद्द कर दिया था. राज्य सरकार ने इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.

2010 में शुरू हुआ था विवाद

जामाडीह मौजा की 141.50 एकड़ जमीन को संरक्षित वन क्षेत्र बताये जाने के बाद वर्ष 2010 में राज्य सरकार और बीसीसीएल के बीच कानूनी विवाद शुरू हुआ. राज्य सरकार ने 25 अगस्त 2010 को आदेश संख्या 3926 जारी कर जमीन पर खनन बंद करने का निर्देश दिया था. सरकार का तर्क था कि संबंधित जमीन संरक्षित वन क्षेत्र है और आवश्यक अनुमति के बिना वहां खनन किया जा रहा है.

इसके बाद राज्य सरकार ने 17 अगस्त 2016 को संशोधित आदेश संख्या 388 जारी किया. इस आदेश में प्लॉट संख्या 437, 230 और 419 को वनभूमि के दायरे से बाहर कर दिया गया था. बीसीसीएल ने दोनों सरकारी आदेशों को हाइकोर्ट में चुनौती दी थी.

बीसीसीएल ने पहले से खनन होने की दी थी दलील

हाइकोर्ट में बीसीसीएल की ओर से कहा गया था कि संबंधित जमीन पहले बंगाल कोल कंपनी के अधीन थी. कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद यह जमीन केंद्र सरकार और कोयला मंत्रालय के अधीन आ गयी. कंपनी ने दलील दी थी कि संबंधित क्षेत्र में पहले से खनन गतिविधियां संचालित होती रही हैं और बाद में बीसीसीएल द्वारा भी खनन किया जाता रहा.

वहीं, राज्य सरकार ने भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 29(3) का हवाला देते हुए कहा था कि जमीन को संरक्षित वन घोषित किया गया है. इसलिए बिना अनुमति खनन करना कानून के खिलाफ है. इसी आधार पर बीसीसीएल के तत्कालीन प्रबंध निदेशक के खिलाफ कार्रवाई के लिए कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था.

हाइकोर्ट ने रद्द कर दिये थे दोनों आदेश

मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद झारखंड हाइकोर्ट ने अक्टूबर 2024 में अपना फैसला सुरक्षित रखा था. नवंबर 2024 में फैसला सुनाते हुए अदालत ने राज्य सरकार की ओर से वर्ष 2010 और 2016 में जारी दोनों आदेशों को रद्द कर दिया था.

हाइकोर्ट ने भारतीय वन अधिनियम की धारा 29(3) के इस्तेमाल में हुई देरी पर भी सवाल उठाया था. अदालत ने कहा था कि कोयला राष्ट्रीयकरण कानून, 1973 के तहत संबंधित क्षेत्र में खनन गतिविधियां चल रही थीं. ऐसे में पर्याप्त जांच और रिपोर्ट के बिना वन अधिनियम की धारा 29(3) का हवाला देकर खनन रोकने का आदेश जारी करना उचित नहीं था.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से विवाद का पटाक्षेप

हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ झारखंड सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गयी थी. सुप्रीम कोर्ट ने अब इस याचिका को खारिज कर दिया है. अदालत के इस फैसले के बाद जामाडीह मौजा की 141.50 एकड़ जमीन पर खनन को लेकर राज्य सरकार और बीसीसीएल के बीच करीब 16 वर्षों से चला आ रहा कानूनी विवाद समाप्त हो गया है.


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By Manohar kumar

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