Shravani Mela: बाबाधाम में मोर मुकुट चढ़ाने की परंपरा के बारे में कितना जानते हैं आप?

Shravani Mela: बैद्यनाथ धाम में भगवान शिव को मोर मुकुट चढ़ाने की परंपरा सालों से चली आ रही है. क्या आपको पता है इस परंपरा के बारे में? आइए जानते हैं.

Shravani Mela: झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक है. बाबा के इस धाम में पूजन की अलग-अलग परंपरा है. उन्हीं में से एक है- मोर मुकुट चढ़ाने की परंपरा. आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे.

क्या है मोर मुकुट चढ़ाने की परंपरा?

बैद्यनाथ धाम में शिवरात्रि के दिन मुख्य रूप से यह परंपरा निभाई जाती है. इस दिन बाबा को मोर का मुकुट चढ़ाया जाता है. इसको आम बोलचाल की भाषा में सेहरा भी कहते हैं.

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क्यों चढ़ाते हैं मोर मुकुट?

कई बार लोग बाबा के दरबार में कन्या की शादी की मन्नत मांगने आते हैं. मन्नत पूरी हो जाने पर बाबा भोलेनाथ को मोर मुकुट चढ़ाते हैं. इसके अलावा, नई-नई शादी होने पर भी यह परंपरा निभाई जाती है.

मोर मुकुट ही क्यों?

मोर मुकुट राधा-कृष्ण के प्रेम का प्रतीक है. एक बार एक मोर के नृत्य करते समय उसका पंख नीचे गिर गया. उसके बाद कृष्ण ने राधा के प्रेम के प्रतीक के रूप में उस मोर पंख को अपने मुकुट पर सजा लिया. तभी से इस मुकुट को प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है.

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ऐसे तैयार होता है मुकुट

भगवान शिव को चढ़ाया जाने वाला मोर मुकुट कई दिनों की मेहनत के बाद तैयार होता है. इसको बांस, सोनाठी, रंगीन पेपर की सहायता से तैयार किया जाता है.

आसपास से खरीद सकते हैं मुकुट

मुकुट को बड़ा और छोटा दो रूप में तैयार किया जाता है. इनमें से बड़े वाला बाबा भोलेनाथ के लिए होता है. अन्य मुकुट जनता के लिए बनाए जाते हैं. इस मुकुट को आसपास की दुकानों से खरीदकर बाबा को चढ़ा सकते हैं.

रोहिणी गांव है मोर मुकुट के लिए प्रसिद्ध

बाबा के इस मुकुट को देवघर से लगभग 7 किलोमीटर दूर एक गांव में बनाया जाता है. रोहिणी गांव को मोर मुकुट गांव के नाम से भी जाना जाता है. रोहिणी गांव के कारीगर इस विशेष मुकुट को तैयार करते हैं. यह परंपरा इस गांव में सदियों से चली आ रही है.

सावन या श्रावणी मेला 2024 कब से है?

सावन के महीने की शुरुआत 22 जुलाई से हो रही है. वर्ष 2024 में श्रावणी मेला भी इसी दिन से लगेगा. देवघर में एक महीने का मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करने के लिए दूर-दूर से आते हैं.

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Published by: Ashish srivastav

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