मिले मदद का दीप तो मिट सकता है मीना के जीवन का अंधेरा
आशीष कुंदन देवघर : सदर अस्पताल के महिला वार्ड में बेड नंबर चार पर पड़ी आदिवासी महिला मीना (काल्पनिक नाम) को किसी फरिश्ते का इंतजार है. शारीरिक उत्पीड़न की शिकार मीना को आर्थिक ही नहीं भावनात्मक सहारे की भी जरूरत है. लेकिन, वह बिस्तर पर पड़ी-पड़ी बेगाना हो गयी है. सरकारी डॉक्टर आते हैं, उसके […]
आशीष कुंदन
देवघर : सदर अस्पताल के महिला वार्ड में बेड नंबर चार पर पड़ी आदिवासी महिला मीना (काल्पनिक नाम) को किसी फरिश्ते का इंतजार है. शारीरिक उत्पीड़न की शिकार मीना को आर्थिक ही नहीं भावनात्मक सहारे की भी जरूरत है. लेकिन, वह बिस्तर पर पड़ी-पड़ी बेगाना हो गयी है. सरकारी डॉक्टर आते हैं, उसके रक्तचाप, धड़कन आदि मापकर और दवा-इंजेक्शन देकर चले जाते हैं. मगर वह अंदर ही अंदर सिसकती रहती है. उसके चेहरे पर वेदना के चिह्न साफ दिखते हैं, लेकिन हादसे की दहशत से वह अब भी बाहर नहीं निकल पायी है. बीते शनिवार को मीना होश में तो आ गयी लेकिन अब भी कुछ बोलने-बताने में असमर्थ है.
बगल में बैठी उसकी लाचार मां को समझ में नहीं आता कि वह क्या करे. मां चाहती है कि मीना पहले की तरह स्वस्थ्य हो जाये. लेकिन उसके पास बेहतर इलाज कराने के संसाधन व स्रोत नहीं है. दशहरे के दूसरे दिन उसे सदर अस्पताल में भर्ती कराया था. उसे गंभीर हालत में चितरा थाना की पुलिस ने सदर अस्पताल लाया था. अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार, मीना के साथ शारीरिक ज्यादती हुई है. उसके शरीर पर कई घाव थे, जो उसके साथ हुई अमानवीयता की कहानी बयां कर रहे थे. डॉक्टर के अनुसार, वह दहशत व सदमे के कारण शॉक्ड (बेसुध) थी.
बहरहाल, दो दिन बाद दीपावली मनायी जायेगी. लोग अंधकार को मिटाने के लिए जगह-जगह रोशनी करेंगे. घर-गली-मोहल्ले प्रकाशित किये जायेंगे. लेकिन बेवजह अवसाद के घने अंधकार में धकेल दी गयी निर्दोष मीना की त्रासदी के बारे में दुनिया नहीं जानती. अगर बढ़े मदद का कोई मजबूत हाथ तो मीना के जीवन की खोयी रोशनी लौट सकती है. उम्मीद के उसके बुझे दीये फिर से प्रकाशवान हो सकते हैं. और इस तरह दीपावली को रिवाजों व औपचारिकताओं से बाहर भी साकार किया जा सकता है.
