DAHARE TUSU : जमशेदपुर में 5 जनवरी को होगा डहरे टुसू, कुड़मी समाज का होगा महाजुटान

DAHARE TUSU : मानगो बालीगुमा स्थित करम अखड़ा में रविवार को वृहद झारखंड कला संस्कृति मंच के बैनर तले डहरे टुसू कार्यक्रम की तैयारी बैठक हुई. बैठक में निर्णय लिया गया कि 5 जनवरी को भव्य डहरे टुसू का आयोजन किया जायेगा.

DAHARE TUSU : मानगो बालीगुमा स्थित करम अखड़ा में रविवार को वृहद झारखंड कला संस्कृति मंच के बैनर तले डहरे टुसू कार्यक्रम की तैयारी बैठक हुई. बैठक में निर्णय लिया गया कि 5 जनवरी को भव्य डहरे टुसू का आयोजन किया जायेगा. जिसमें हजारों की संख्या में आदिवासी-मूलवासी समाज के लोग अपनी सामाजिक व सांस्कृतिक एकता परिचय देंगे. वक्ताओं ने कहा कि लौहनगर जमशेदपुर में तीसरी बार डहरे टुसू का आयोजन होगा. शहर के लोगों को डहरे टुसु की परंपरा को फिर लोक नृत्य, लोक संगीत और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने का अवसर प्राप्त होगा. वृहद झारखंड कला संस्कृति के द्वारा पुरे झारखंड में 3 साल के दौरान 13 डहरे कार्यक्रम का अबतक आयोजन किया जा चुका है. बैठक में में दीपक रंजीत, दिलीप कुमार महतो, मंटु महतो, संतोष कुमार महतो, प्रताप महतो, अंकुर कुमार महतो, चंदन महतो, सुमन महतो, बिरसा महतो, प्रकाश महतो, राजेश महतो, चंदन महतो, इंद्रजीत महतो, बुद्देश्वर महतो, महेश महतो, काकोली महतो, देवदीप महतो, देवाशीष महतो, प्रहलाद महतो, बीरसिंह महतो, जगदीश महतो, अनिल कुमार महतो, राहुल कुमार महतो, लाल महतो आदि उपस्थित थे.

बंगाल, ओडिशा व छत्तीसगढ़ से भी शिरकत करेंगे लोग

झारखंड कला संस्कृति मंच के दीपक रंजीत ने बताया कि डहरे टुसु कार्यक्रम का आयोजन इस बार और भी व्यापक स्तर पर किया जाएगा. गत वर्ष यह आयोजन 8 जनवरी को जमशेदपुर में हुआ था, जिसे लोगों का भरपूर समर्थन मिला था. इस बार कार्यक्रम में बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक प्रेमियों की भागीदारी विशेष आकर्षण होगी. डहरे टुसु के माध्यम से जनजातीय कला, लोक नृत्य और संगीत को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा. यह आयोजन न केवल पारंपरिक विरासत को संरक्षित करने का माध्यम बनेगा, बल्कि विभिन्न राज्यों की संस्कृतियों को एक मंच पर लाने का भी प्रयास करेगा. सामूहिक नृत्य और गीतों के साथ यह उत्सव क्षेत्रीय एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक बनेगा.

अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचायेंगे

डहरे टुसु की परंपरा झारखंड और बंगाल के जनजातीय क्षेत्रों में हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है. यह पर्व खेती के समापन और नए साल के स्वागत के प्रतीक रूप में मनाया जाता है. इस अवसर पर गांव-गांव में लोक नृत्य, लोक संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जो जनजातीय संस्कृति और परंपराओं को जीवंत बनाए रखते हैं.टुसु गीतों में स्थानीय जीवन, प्रकृति, प्रेम और सामाजिक मुद्दों की झलक मिलती है. महिलाएं रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में नृत्य करती हैं और पुरुष ढोल, नगाड़े और बांसुरी की धुनों से वातावरण को उल्लासमय बनाते हैं. डहरे टुसु की यह परंपरा सांस्कृतिक एकता और सामुदायिक भावना को बढ़ावा देती है. इसमें भाग लेकर लोग न केवल अपनी विरासत से जुड़ते हैं, बल्कि इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने में भी सहयोग करते हैं. यह पर्व भारतीय लोक संस्कृति की समृद्धि का जीवंत उदाहरण है.

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Author: Dashmat Soren

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