कठिन परिश्रम और लगन से असंभव को संभव बनाया जा सकता है. बंजर भूमि को उपजाऊ बनाकर उन्होंने न केवल अपनी जिंदगी बदली, बल्कि समाज में भी प्रेरणा का स्रोत बनीं. आज लोग उनकी प्रशंसा करते हैं और उनकी सफलता को एक उदाहरण मानते हैं. सुनीता देवी ने दिखा दिया है कि जुनून और मेहनत से बंजर भूमि भी सोना उगल सकती है. विजय शर्मा इटखोरी. सासाराम से इटखोरी आई सुनीता देवी की जीवन यात्रा मेहनत और जुनून की मिसाल है. लगभग बीस वर्ष पहले उन्होंने फुटपाथ पर कपड़ों की फेरी से जीवनयापन शुरू किया था. उस समय उनके पास अपनी खेती योग्य भूमि नहीं थी. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और बटाईदार के रूप में खेती शुरू की. जिस भूमि पर कभी घास तक नहीं उगती थी, उसे उन्होंने अपनी अथक मेहनत से उपजाऊ बना दिया. सुनीता देवी जेएसएलपीएस के पार्वती महिला समूह की सक्रिय सदस्य हैं. कई लोग खेती का विधि सीखने आते हैं उसने कहा कि शुरुआती दिनों में बैगन व धान की खेती करती थी, उसके बाद स्थानीय भूमि मालिक मेरे मेहनत व खेती को देखकर काफी खुश हुए. उनलोगों ने मुझे अपने परती जमीन में खेती करने के लिए प्रेरित किया. उसके बाद से मौसम के अनुसार अलग-अलग फसलों का खेती करती हूं. उसने कहा कि खेती कर खुशहाल हूं, मेरे मेहनत को देखकर लोग प्रशंसा करते हैं. उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान किया जाता, तो आधुनिक तकनीक से खेती करती. उन्होंने कहा कि मैं खेती में लीन हो गयी हूं. मेरे पति कपड़े का फेरी करते हैं. कई लोग खेती का विधि सीखने आते हैं. मेरे मेहनत व जुनून ने बंजर भूमि को पीला व हरा भरा बना दिया है. आज सुनीता देवी इटखोरी में 27 एकड़ भूमि पर खेती कर रही हैं. सभी खेत बटाई पर हैं. उन्होंने छह एकड़ में सरसों, पंद्रह एकड़ में गेहूं और छह एकड़ में चना लगाया है. खेतों में सरसों की पीली चमक और गेहूं की हरी लहरें उनकी सफलता की गवाही देती हैं.
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