रांची से आनंद मोहन की रिपोर्ट
Rajya Sabha Election: झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. चुनावी सरगर्मियों के बीच महागठबंधन में दरार की चर्चा शुरू हो गई है. कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के बीच उम्मीदवार चयन को लेकर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं. कांग्रेस द्वारा राज्यसभा चुनाव के लिए बोकारो निवासी प्रणव झा को उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद झामुमो ने भी दोनों सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर दिया है. इससे महागठबंधन के भीतर राजनीतिक तकरार बढ़ गई है.
कांग्रेस ने घोषित किया प्रत्याशी, झामुमो ने दिखाई नाराजगी
राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने गुरुवार देर रात बोकारो के प्रणव झा को अपना उम्मीदवार घोषित किया. पार्टी के इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं. विपक्षी दलों के साथ-साथ कांग्रेस के भीतर भी इस फैसले को लेकर सवाल उठने लगे हैं. राजनीतिक हलकों में प्रणव झा को “पैराशूट उम्मीदवार” बताया जा रहा है. चर्चा है कि उनका जन्म भले ही झारखंड के बोकारो में हुआ हो, लेकिन राज्य की सक्रिय राजनीति और संगठनात्मक गतिविधियों से उनका सीधा जुड़ाव सीमित रहा है. बताया जा रहा है कि प्रणव झा के नाम पर अंतिम मुहर कांग्रेस आलाकमान ने लगाई है. इसी कारण प्रदेश कांग्रेस के कई नेताओं में नाराजगी देखी जा रही है.
फुरकान अंसारी ने सोशल मीडिया पर जताई नाराजगी
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और गोड्डा के पूर्व सांसद फुरकान अंसारी ने भी अप्रत्यक्ष रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की है. उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा कि वर्षों तक पार्टी के लिए समर्पित होकर काम करने के बावजूद उनके नाम पर विचार नहीं किया गया. फुरकान अंसारी की प्रतिक्रिया के बाद यह चर्चा और तेज हो गई कि कांग्रेस के भीतर उम्मीदवार चयन को लेकर सबकुछ सामान्य नहीं है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि असंतोष बढ़ता है तो इसका असर चुनावी रणनीति पर भी पड़ सकता है.
मुख्यमंत्री आवास पर हुई झामुमो की अहम बैठक
शुक्रवार दोपहर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास पर झामुमो की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई. बैठक में पार्टी के सांसद, विधायक, मंत्री और वरिष्ठ नेता मौजूद रहे. बैठक का मुख्य एजेंडा राज्यसभा चुनाव और उम्मीदवार चयन को लेकर पार्टी की रणनीति तय करना था. बैठक के बाद झामुमो नेताओं ने स्पष्ट संकेत दिया कि पार्टी दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने के पक्ष में है. नेताओं का कहना था कि राज्य में झामुमो सबसे बड़ा दल है और उसे दोनों सीटों पर दावा करने का अधिकार है.
हफीजुल हसन बोले, दोनों सीटों पर होगा झामुमो का दावा
बैठक के बाद मंत्री हफीजुल हसन ने मीडिया से बातचीत में कहा कि झामुमो का रुख पूरी तरह स्पष्ट है. उन्होंने कहा कि पार्टी चाहती है कि राज्यसभा की दोनों सीटों पर झामुमो के उम्मीदवार चुनाव लड़ें. उन्होंने बताया कि उम्मीदवारों के नाम तय करने के लिए पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष को अधिकृत कर दिया गया है. कांग्रेस द्वारा उम्मीदवार घोषित किए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि वह बाद की बात है, लेकिन झामुमो का स्टैंड पहले से साफ है. हफीजुल हसन के इस बयान को राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी अपने रुख से पीछे हटने के मूड में नहीं है.
बैद्यनाथ राम ने उम्मीदवार उतारने के दिए संकेत
झामुमो विधायक बैद्यनाथ राम ने भी बैठक के बाद पार्टी का पक्ष मजबूती से रखा. उन्होंने कहा कि सभी सांसदों, विधायकों और मंत्रियों ने सर्वसम्मति से दोनों सीटों पर झामुमो के उम्मीदवार उतारने की इच्छा जताई है. उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सहमति के बिना उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर दी. बैद्यनाथ राम ने कहा कि पार्टी नेताओं ने अपनी भावनाएं मुख्यमंत्री तक पहुंचा दी हैं और सभी चाहते हैं कि दोनों सीटों पर झामुमो के उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरें. उन्होंने बताया कि अंतिम निर्णय लेने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अधिकृत कर दिया गया है.
महागठबंधन की एकजुटता पर उठे सवाल
झामुमो के इस रुख के बाद महागठबंधन की एकजुटता को लेकर सवाल उठने लगे हैं. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि दोनों दल अपने-अपने उम्मीदवार मैदान में उतारते हैं तो यह गठबंधन के भीतर समन्वय की कमी को उजागर करेगा. राज्यसभा चुनाव आमतौर पर संख्या बल और राजनीतिक रणनीति का चुनाव माना जाता है. ऐसे में उम्मीदवार चयन को लेकर उत्पन्न विवाद आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति को और गर्मा सकता है.
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हेमंत सोरेन के फैसले पर टिकी निगाहें
फिलहाल राज्यसभा चुनाव को लेकर पूरे राजनीतिक घटनाक्रम पर सबकी नजर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और झामुमो नेतृत्व के अगले कदम पर टिकी हुई है. आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि महागठबंधन के दोनों दल आपसी सहमति से कोई रास्ता निकालते हैं या फिर राज्यसभा चुनाव में अलग-अलग राजनीतिक दावेदारी पेश करते हैं. इतना तय है कि राज्यसभा चुनाव ने झारखंड की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है और इसका असर आने वाले समय में गठबंधन की राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है.
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