Chaibasa News : हो समाज का दस्तूर प्रकृति में समाहित, युवा वर्ग बचाये

हो समाज का दस्तूर प्रकृति में समाहित, युवा वर्ग बचाये

चाईबासा.

नामा सगेन महिला समिति और देशाउली फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में बुधवार को चाईबासा के टीआरटीसी गुइरा में हो समुदाय का तीन दिवसीय दस्तूर कार्यशाला सह प्रशिक्षण शिविर का समापन हुआ. यहां हो समुदाय का जन्म, विवाह और मरण दस्तूर का गहरा अध्ययन के लिए कोल्हान से 70 युवा शामिल हुए. कमेटी की अध्यक्ष हीरामनी देवगम ने कहा कि युवा अपनी आदिवासी संस्कृति को भूल रहे हैं, क्योकि दस्तूर के बारे में किसी विद्यालय में पढ़ाई नहीं होती है. युवा मोबाइल व सोशल मीडिया में खोये रहते हैं. इस कार्यक्रम के माध्यम से युवाओं को एक मंच दिया गया है. वह अपने दस्तूर के बारे में जान सकेंगे.

मां के गर्भ से दस्तूर के अधीन आ जाता है बच्चा: सुशीला बोदरा ने कहा कि आदिवासियों में मां के गर्भ से बच्चा दस्तूर के अधीन आ जाता है. गर्भावस्था में आंगन मे सिंगबोंगा के नाम से सादा मुर्गा की पूजा होती है. यह माना जाता है कि गर्भवती महिला का प्रसव ईश्वर के आशीर्वाद से अच्छी तरह से हो. प्रकाश पुरती ने शादी दस्तूर के बारे में बताया. रोबिन आल्डा ने कहा कि आदिवासी समाज में किसी की मृत्यु होने पर सम्मान पूर्वक हल्दी पानी से नहलाया जाता है. उसके बाद धान तेला कराया जाता है. उनके बाद उनकी संपत्ति पर उनके वारिस का अधिकार होगा. प्रोफेसर दिलदार पुरती कहा कि हमारा दस्तूर खुद ही ज्ञान का सागर है. हमारे पूर्वजों के पास पारंपरिक ज्ञान है. वे भविष्यवाणी बता सकते हैं. हमारे दस्तूर में पूरी प्रकृति समायी हुई है. आज हमारा दस्तूर खतरे में है. उसे बचाने की जिम्मेवारी युवाओं की है. मौके पर मोनिका बुड़िउली ने सभी दस्तूर पर गीत प्रस्तुत किया. इस कार्यक्रम में रमेश जेराई, पोंडा हेस्सा, जगन्नाथ हेस्सा, नरेश देवगम, रेयांश सामड, बनमाली तमसोय, डेजी हेंब्रम, जांबी कुदादा, शकुंतला गागराई, राखी गोप, सुषमा बिरुली आदि उपस्थित थे.

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Author: ATUL PATHAK

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