Chaibasa News : जल, जंगल व जमीन बचाने को सड़कों पर उतरे आदिवासी संगठन

सारंडा को वाइल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित करने के विरोध में आदिवासी समुदाय की हुंकार

चाईबासा. सारंडा को वाइल्ड लाइफ सेंचुरी (वन्य जीव अभ्यारण्य) घोषित करने के विरोध में आदिवासी-मूलवासी के सामाजिक संगठनों के बैनर तले मंगलवार को गांधी मैदान (चाईबासा) से जनाक्रोश रैली निकाली गयी. रैली गांधी मैदान से निकलकर सदर थाना चौक, जैन मार्केट चौक, कचहरी, टुंगरी होते हुए समाहरणालय पहुंची, जहां प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त को ज्ञापन सौंपा. रैली में शामिल लोग हाथों में स्लोगन लिखी तख्तियां लिए केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए आगे बढ़ रहे थे. इस दौरान जिले के सभी प्रखंडों से आये आदिवासी-मूलवासी पारंपरिक तीर-धनुष जैसे हथियारों से लैस थे. मौके पर आदिवासी मुंडा समाज विकास समिति के केंद्रीय अध्यक्ष बुधराम लागुरी ने कहा कि जल, जंगल और जमीन हमारी है, किसी भी हालत में कोल्हान के सारंडा को वन्यजीव अभ्यारण्य नहीं बनने देंगे. क्योंकि सारंडा हमारी विरासत है और विस्थापन हमें स्वीकार नहीं है. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए. अगर सुप्रीम कोर्ट सारंडा वन्य जीव अभ्यारण्य पर पुनर्विचार नहीं करता है तो, आदिवासी-मूलवासी के संगठनों द्वारा 25 अक्तूबर को सारंडा व कोल्हान में आर्थिक नाकेबंदी की जायेगी. जिला से एक भी लोहा का कण बाहर नहीं जायेगा. रैली के बाद राज्यपाल के नाम उपायुक्त को ज्ञापन सौंपा गया. रैली में कोल्हान रक्षा संघ, आदिवासी मुंडा समाज विकास समिति सहित सैकड़ों सामाजिक संगठनों के महिला और पुरुष सदस्य शामिल थे. वहीं, जिला व पुलिस प्रशासन की ओर से काफी संख्या में पुलिस बल की तैनात की गयी थी. रैली के साथ एसडीओ संदीप अनुराग टोपनो, एसडीपीओ बहामन टूटी, सीओ उपेंद्र कुमार, बीडीओ अमिताभ भगत, सार्जेंट मेजर मंशु गोप, सदर थानेदार तरुण कुमार समेत पुलिस बल शामिल थे.

हमारा सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक अस्तित्व मिट जायेगा : लागुरी

आदिवासी मुंडा समाज विकास समिति के केंद्रीय अध्यक्ष बुधराम लागुरी ने कहा कि सारंडा जंगल को किसी भी कीमत पर वन्यजीव अभयारण्य घोषित नहीं होने दिया जायेगा. उनका कहना था कि इसके घोषित होने से आदिवासी समुदाय की रोजी-रोटी छिन जायेगी. उन्होंने बताया कि सारंडा वन क्षेत्र में स्थित राजस्व ग्रामों और वन ग्रामों में रहने वाले हजारों आदिवासी-मूलवासी और आदिम जनजाति समूहों में भारी जनाक्रोश है. सारंडा केवल वन्यजीव का आश्रय स्थल नहीं है, बल्कि आदिकाल से यहां परंपरागत रूप से बसे आदिम जनजाति और आदिवासी-मूलवासी समुदाय का घर है. सारंडा वन क्षेत्र में लगभग 50 राजस्व ग्राम और 10 वन ग्राम हैं, जिनमें करीब 75 हजार लोग निवास करते हैं. इनका सारंडा जंगल से सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से अटूट संबंध है. जंगल में स्थित देवस्थल, सरना, देशाउली, ससनदिरी, मसना आदि स्थलों से उनकी विशिष्ट सामाजिक पहचान और अस्तित्व सुरक्षित है. उन्होंने कहा कि जंगल से प्राप्त लघु वनोपज और जड़ी-बूटी ही आजीविका का मुख्य आधार हैं. इसके अलावा सारंडा में लौह अयस्क की कई खदान हैं, जहां रोजगार मिलता है और आर्थिक हित जुड़े हुए हैं. सारंडा वन क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने से गांव, सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक अस्तित्व समाप्त हो जायेगा. साथ ही आजीविका और रोजगार भी छिन जायेंगे.

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Author: ATUL PATHAK

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