15 साल बाद भी सरकारी कामकाज से दूर हो भाषा, चाईबासा में धरातल पर लागू कराने की बनी रणनीति

हो भाषा को द्वितीय राजभाषा का दर्जा मिले 15 साल हो गए, लेकिन सरकारी कामकाज में इसका उपयोग अब तक नहीं हो पाया है. चाईबासा में सामाजिक संगठनों ने इसे धरातल पर उतारने के लिए पहल तेज कर दी है. अब पत्राचार और जागरूकता अभियान पर जोर दिया जाएगा.

चाईबासा. झारखंड में वर्ष 2011 में हो भाषा को द्वितीय राजभाषा का दर्जा मिलने के बावजूद सरकारी कामकाज और कार्यालयी पत्राचार में इसके अपेक्षित उपयोग नहीं होने पर अब सामाजिक संगठनों ने इसे धरातल पर लागू कराने की पहल तेज करने का निर्णय लिया है. इसी मुद्दे को लेकर बुधवार देर शाम चाईबासा में आदिवासी हो द्वितीय राजभाषा कार्य समिति की बैठक हुई. बैठक में हो भाषा में सरकारी विभागों से पत्राचार को बढ़ावा देने और लोगों को द्वितीय राजभाषा के अधिकार के प्रति जागरूक करने का निर्णय लिया गया.

टीपी साहु, हिल व्यू अपार्टमेंट में जिला संयोजक और पूर्व हो भाषा वरिष्ठ शिक्षक बागुन बोदरा की अध्यक्षता में हुई बैठक में दो सूत्री प्रस्ताव पारित किए गए. इसके तहत आदिवासी हो समुदाय की सभी संस्थाओं और संगठनों को हो भाषा में सरकारी विभागों से पत्राचार अभियान से जोड़ने तथा झारखंड में हो भाषा को मिले द्वितीय राजभाषा के दर्जे को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान चलाने पर सहमति बनी.

कहा- केवल दर्जा नहीं, सरकारी कामकाज में हो व्यवहारिक उपयोग

बैठक में सदस्यों ने कहा कि द्वितीय राजभाषा का दर्जा मिलने के 15 वर्ष बाद भी सरकारी कार्यालयों में हो भाषा के प्रयोग की स्थिति संतोषजनक नहीं है. इसे केवल दर्जे तक सीमित रखने के बजाय सरकारी कामकाज और कार्यालयी पत्राचार में व्यवहारिक रूप से लागू करने की जरूरत है.

समिति का मानना है कि सरकारी विभागों से हो भाषा में पत्राचार को बढ़ावा देने से लोगों को अपने राजभाषा अधिकार के प्रति जागरूक करने में भी मदद मिलेगी. इसी उद्देश्य से संस्थाओं और संगठनों को अभियान से जोड़ने का निर्णय लिया गया है.

1837 से प्रशासनिक और कानूनी उपयोग का दिया संदर्भ

बैठक में कहा गया कि चाईबासा और कोल्हान क्षेत्र में हो भाषा का प्रशासनिक एवं कानूनी उपयोग वर्ष 1837 से जुड़ा रहा है. वर्तमान झारखंड में राजस्व विभाग की ओर से आयोजित विभागीय परीक्षाओं में भी राजपत्रित पदाधिकारियों और अराजपत्रित कर्मचारियों के लिए हो भाषा से संबंधित परीक्षा की व्यवस्था रही है.

समिति के सदस्यों ने कहा कि इसके बावजूद कार्यालयी स्तर पर हो भाषा के व्यापक इस्तेमाल को लेकर अपेक्षित गति नहीं आ सकी है. 1837 से 2026 तक करीब 190 वर्षों के लंबे सफर में हो भाषा को कार्यालयी भाषा के रूप में व्यापक स्वीकार्यता दिलाने की मांग बनी हुई है. अब इस दिशा में संगठित प्रयास तेज करने की जरूरत है.

ये रहे उपस्थित

बैठक में पश्चिमी सिंहभूम जिला चाईबासा संयोजक डोबरो बुड़ीउली, पूर्वी सिंहभूम जिला संयोजक काशराय कुदादा, सतीश सामड, बुद्धेश्वर बारी सहित अन्य सदस्य उपस्थित थे.

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By Anil Ranjan

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