झींकपानी.
पश्चिमी सिंहभूम जिला के तांतनगर थाना के इलीगढ़ा गांव के साधारण युवक बुलबुल अल्डा, जिसकी जिंदगी के फैसलों ने उसे ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया जहां से लौटना संभव नहीं हो सका. करीब चार वर्ष पहले पत्नी द्वारा छोड़ दिए जाने के बाद बुलबुल अवसाद में चला गया. हालात से जूझने के बजाय वह भटकता चला गया. अंत में नक्सली संगठन से जुड़ गया. चार साल बाद उसका शव घर लौटा.परिजन को दो साल बाद पता चला
बुलबुल की माता एवं भाई ने बताया कि एक दिन वह बिना किसी को बताये काम के सिलसिले में घर से निकला और फिर घर लौटकर नहीं आया. हमलोगों ने उसे कई माह तक खोजा, रिश्तेदारों से पूछा, आसपास के इलाकों में तलाश की, हर जगह से निराशा हाथ लगी. करीब दो साल बाद जब पुलिस उसकी तलाश में गांव पहुंची, तब परिवार को पहली बार यह सच्चाई पता चली कि उसका बेटा नक्सली संगठन में शामिल हो चुका है.‘मैं अपने बेटे को वापस नहीं ला सकी सक्रिय नक्सली अपने घर लौट आयें’
मां ने बताया कि हर दिन बेटे के लौट आने की आस देखती रहती. साल दर साल बीतते गए, पर बुलबुल की कोई खबर नहीं मिली. इंतजार करते-करते आंखें पथरा गईं, मगर दिल की उम्मीद आखिरी सांस तक जिंदा रही. फिर आया 22 जनवरी जिसने इस इंतजार को हमेशा के लिए खत्म कर दिया. नक्सली मुठभेड़ में 17 नक्सली मारे गए. इसी में बुलबुल अल्डा भी शामिल था. जैसे ही यह खबर गांव और परिवार तक पहुंची. घर में मातम छा गया. जिस बेटे के लौटने की दुआएं मां ने उम्र भर मांगीं, वह शव बनकर लौटा था. बुलबुल की मां व भाई मधुसूदन अल्डा उसे सुरक्षित घर नहीं ला सके, पर उन्होंने सारंडा क्षेत्र में मौजूद माओवादियों से अनुरोध किया है कि वे हिंसा का रास्ता छोड़कर घर लौट आयें. अपने परिवार को राहत दें.
