चक्रधरपुर: कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा की अंगीभूत इकाई जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय, चक्रधरपुर में ओड़िया के असिस्टेंट प्रोफेसर संजय बारिक सिर्फ शिक्षक नहीं, बल्कि संघर्ष और हौसले की मिसाल हैं. जन्म के तीन साल बाद ही उनकी आंखों की रोशनी चली गयी. इसके बावजूद उन्होंने परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी और मेहनत व लगन से उच्च शिक्षा हासिल कर आज विद्यार्थियों को मातृभाषा ओड़िया पढ़ा रहे हैं.
दृष्टि बाधित होने के बाद भी जारी रखी पढ़ाई
संजय बारिक का जीवन संघर्षों से भरा रहा, लेकिन वे इसे संघर्ष की तरह नहीं देखते. उन्होंने 1995 में भीमोभुई दृष्टिहीन स्कूल, भुवनेश्वर से मैट्रिक, 1997 में बीजेबी कॉलेज से इंटर और 2000 में ओड़िया ऑनर्स के साथ स्नातक की पढ़ाई पूरी की. वर्ष 2002 में उत्कल विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर, 2004 में एमफिल और 2005 में नेट व जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण की. उनका मानना है कि कठिनाइयां जीवन का हिस्सा हैं और उन्हें लेकर सोचने का नजरिया ही सबसे महत्वपूर्ण है.
18 वर्षों से विद्यार्थियों को दे रहे शिक्षा
संजय ने अपने शिक्षण करियर की शुरुआत कटक स्थित अपने गांव से की थी. इसके बाद वर्ष 2008 में कतरासगढ़ गवर्नमेंट कॉलेज, धनवार में असिस्टेंट प्रोफेसर बने और करीब तीन वर्षों तक विद्यार्थियों को पढ़ाया. वर्ष 2016 से वे जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय, चक्रधरपुर में ओड़िया के असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं. करीब 18 वर्षों से वे लगातार शिक्षण कार्य कर रहे हैं.
याददाश्त और एकाग्रता के कायल हैं साथी
संजय बारिक की याददाश्त बेहद तेज है. एक बार कुछ सुन लेने के बाद उसे लंबे समय तक याद रखते हैं. उनकी कक्षा में किताबों के साथ जीवन के वास्तविक उदाहरणों का भी इस्तेमाल होता है, जिससे विद्यार्थी उनसे आसानी से जुड़ते हैं. उनके सहकर्मी भी उनकी प्रतिभा, एकाग्रता और आत्मविश्वास के कायल हैं. संजय मूल रूप से ओडिशा के कटक जिले के चिलिका बोउलोबांधो गांव के निवासी हैं. उनके पिता मंगराज बारिक कृषक और माता सावित्री बारिक गृहिणी हैं. फिलहाल वे चक्रधरपुर के ब्लॉक कॉलोनी में किराए के मकान में रहते हैं.
