Bokaro News : विस्थापितों की समस्याओं को लेकर पूर्व सीएम ने दी आंदोलन की चेतावनी

Bokaro News : विस्थापितों की समस्याओं को लेकर पूर्व सीएम ने आंदोलन की चेतावनी दी है.

बोकारो के विस्थापितों के अधिकार की लड़ाई लड़ी जायेगी. अगर डेढ़ महीने में अप्रेंटिसशिप कर चुके युवाओं को नौकरी व विस्थापितों की समस्याओं का समाधान नहीं होता है, तो बोकारो में बड़ा जन आंदोलन शुरू होगा. इसके तहत सभी रैयतों के साथ लाखों लोग एकजुट होकर बोकारो स्टील प्लांट की खाली पड़ी जमीन पर हल चलायेंगे. यह बातें झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने सोशल मीडिया पर लिखी है. श्री सोरेन ने चांडिल, मसानजोर, पंचेत, मैथन, घाटो, कोयलांचल, बोकारो समेत राज्य की अन्य परियोजनाओं से संबंधित लाखों विस्थापितों के मुद्दों का हल कराने के लिए इसी प्रकार आंदोलन करने की बात कही है.

कहा कि बोकारो स्टील प्लांट के लिए करीब 34,000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण 1960 के दशक में हुआ था. इसमें से आधा जमीन पर प्लांट बना. अन्य निर्माण हुए और हजारों एकड़ जमीन आज भी खाली है. भूमि अधिग्रहण कानून 2013 की धारा 24(2) के अनुसार पुराने अधिग्रहण के मामलों में यदि सरकार के पास भौतिक कब्जा (बाउंड्री) नहीं है या मुआवजा का भुगतान नहीं हुआ है, तो अधिग्रहण प्रक्रिया स्वतः समाप्त मानी जाती है.

कैसे पूरी हुई जमीन अधिग्रहण प्रक्रिया?

श्री सोरेन ने सवाल उठाया है कि राज्य सरकार या कंपनी ने भूमि अधिग्रहण के समय जो वादे किये थे, उसे पूरा नहीं किया. विस्थापितों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया. हजारों विस्थापित परिवारों को मुआवजा नहीं मिला है. ऐसे में अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी कैसे हुई? सवाल यह है कि जब 60 वर्षों तक भूमि का इस्तेमाल नहीं कर पाये और उसके कई हिस्सों पर आपका कब्जा भी नहीं है, तो उस जमीन को रैयतों को क्यों नहीं लौटाया जा रहा है?

श्री सोरेन ने कहा कि बोकारो में विकास के नाम पर 64 मौजों की भूमि अधिग्रहित हुई थी. लेकिन, इनमें से सैकड़ों गांवों में पुनर्वास, मुआवजा व स्वामित्व को लेकर दशकों से विवाद चल रहा है. इस जमीन पर लाखों लोग रहते हैं, जो पंचायत से बाहर होने के कारण सरकारी योजनाओं (पानी, बिजली, सड़क, स्वास्थ्य आदि) से वंचित हैं. विस्थापितों का नाम वोटर लिस्ट में तो है, लेकिन जन्म/ मृत्यु प्रमाण पत्र तक बनवाना इनके लिए मुश्किल है. क्योंकि इनके गांव-टोला को सरकारी रिकॉर्ड्स में गायब कर दिया गया है. उनके अस्तित्व को मिटाने की कोशिश हो रही है.

औद्योगिक जोन में मॉल बनाने की अनुमति किसने दी?

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड में औद्योगिक जोन/ लैंड को कॉमर्शियल (मॉल, शॉपिंग सेंटर) में बदलने के लिए लैंड यूज कन्वर्जन (भूमि उपयोग परिवर्तन) की अनुमति लेनी पड़ती है. भूमि राजस्व विभाग व संबंधित शहरी स्थानीय निकाय (नगर निगम आदि) के तहत यह प्रक्रिया होती है. जब बोकारो का यह क्षेत्र किसी नगर निकाय के अंतर्गत नहीं आता है तो यहां मॉल बनाने की अनुमति कौन दे रहा है?

विस्थापितों की इस हालत का जिम्मेदार कौन ?

श्री सोरेन ने लिखा कि 1973 में बीएसएल प्रबंधन ने घोषणा की थी कि 20 मौजा की भूमि अब प्लांट के लिए जरूरी नहीं है. क्योंकि, प्लांट के पास पहले से ही अतिरिक्त भूमि उपलब्ध थी. इसके बावजूद मूल रैयतों को उनकी भूमि का कानूनी स्वामित्व वापस नहीं दिया गया. वे लोग अपने मूल गांवों में ही रहते रहे, लेकिन उनकी जमीन पर आधिकारिक रूप से कब्जा प्लांट/ सरकार के नाम बना रहा. इस कारण वे ना तो पूर्ण मुआवजा पा सके और ना ही नौकरी. इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इन विस्थापितों की कई पीढ़ियां इसमें तबाह हो गयीं. उसकी क्षतिपूर्ति कौन करेगा? जिस क्षेत्र से झारखंड आंदोलन शुरू हुआ, जहां से अलग राज्य के लिए संघर्ष का नेतृत्व होता था, वहां के विस्थापितों की इस हालत का जिम्मेदार कौन है?

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