जैनामोड़. बेरमो विधानसभा क्षेत्र में विकास के दावे भले ही लगातार किये जा रहे हों, लेकिन जरीडीह प्रखंड की टांडबालीडीह पंचायत के कुबड़ीधोव और बड़कीटांड गांव की तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े करती है. प्रखंड मुख्यालय से महज चार किलोमीटर और फोरलेन सड़क से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर बसे इन दोनों गांवों के करीब 2500 लोग आज भी पक्की सड़क का इंतजार कर रहे हैं.
गांव तक पहुंचने वाला करीब पांच किलोमीटर का रास्ता अब भी कच्चा और जर्जर है. बारिश के बाद सड़क पर बिछे पत्थर उभर आये हैं, जिससे पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है. ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से सड़क निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिला.
बच्चों की पढ़ाई से लेकर बाजार जाने तक परेशानी
कुबड़ीधोव और बड़कीटांड के बच्चों को पढ़ाई के लिए गांव से बाहर हाई स्कूल और कोचिंग संस्थानों तक जाने के लिए इसी कच्चे रास्ते से गुजरना पड़ता है. बारिश के दिनों में रास्ते की स्थिति और खराब हो जाती है. नुकीले पत्थरों के कारण बच्चों के गिरने और चोटिल होने की घटनाएं भी आम हैं.
ग्रामीणों के अनुसार, गांव से बाजार और मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए भी इसी रास्ते का इस्तेमाल करना पड़ता है. सड़क पक्की नहीं होने के कारण बाइक और दूसरे वाहनों के आवागमन में भी परेशानी होती है.
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बीमार और गर्भवती महिलाओं को खाट पर लाना पड़ता है
ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी परेशानी आपात स्थिति में होती है. गांव में किसी के बीमार पड़ने या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने की जरूरत होने पर एंबुलेंस गांव तक पहुंचना मुश्किल होता है. ऐसे में मरीज को खाट पर बैठाकर या लिटाकर करीब दो से तीन किलोमीटर दूर लिंक रोड तक ले जाना पड़ता है.
ग्रामीणों का कहना है कि गांव के अधिकांश परिवार मजदूरी पर निर्भर हैं. दैनिक मजदूरी करके परिवार चलाने वाले लोगों के लिए सड़क की समस्या रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है.
चुनाव में हर बार वोट, बदले में सिर्फ आश्वासन
ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता और प्रत्याशी गांव में पहुंचते हैं. सड़क निर्माण समेत मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने का भरोसा दिया जाता है. ग्रामीण भी उम्मीद के साथ मतदान करते हैं कि नई सरकार बनने के बाद उनके गांव की समस्या दूर होगी.
लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद सड़क निर्माण का मुद्दा फिर पीछे छूट जाता है. ग्रामीणों का दावा है कि मुखिया से लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों तक से सड़क निर्माण की मांग की जा चुकी है, लेकिन अब तक ठोस पहल नहीं हुई.
बारिश के बाद और खतरनाक हो जाता है रास्ता
बारिश के पानी के कारण कच्ची सड़क पर जगह-जगह पत्थर और गड्ढे उभर आये हैं. इससे पैदल चलने वालों को काफी परेशानी होती है. ग्रामीण बताते हैं कि हर साल बरसात के बाद गांव के महिला-पुरुष श्रमदान कर रास्ते को किसी तरह चलने लायक बनाते हैं.
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सोमर मांझी हाड़ाम ने कहा कि गांव के दोनों तरफ से रास्ता है, लेकिन दोनों ही रास्ते कच्चे और जोखिम भरे हैं. करीब पांच किलोमीटर लंबे इस रास्ते की स्थिति सुधारने के लिए हर साल ग्रामीणों को खुद मेहनत करनी पड़ती है.
ग्रामीण बोले- पैसे ले लो, लेकिन सड़क बना दो
मनमानी देवी ने कहा कि उनके सास-ससुर की उम्र गुजर गयी, लेकिन गांव तक पक्की सड़क नहीं पहुंच सकी. उन्होंने कहा कि अब भी यह देखना बाकी है कि उनके जीवन में गांव तक पक्की सड़क पहुंचती है या नहीं.
श्रीमती देवी ने कहा कि गांव की जर्जर सड़क से सभी परेशान हैं. रास्ता पत्थरों से भरा हुआ है और आने-जाने में काफी दिक्कत होती है, लेकिन समस्या देखने वाला कोई नहीं है.
सीता देवी ने कहा कि सड़क की हालत बेहद खराब है. वर्षों से उम्मीद है कि अब सड़क बनेगी, लेकिन अभी तक निर्माण शुरू नहीं हुआ.
सहदेव मांझी हाड़ाम ने कहा कि चुनाव के समय प्रत्याशी गांव में आते हैं और सड़क बनवाने का आश्वासन देते हैं. चुनाव जीतने के बाद यह वादा भूल जाते हैं.
बाबू चांद मरांडी ने कहा कि वर्षों से ग्रामीण पक्की सड़क की उम्मीद लगाये बैठे हैं. पता नहीं कब तक उन्हें इसी जर्जर रास्ते से आवागमन करना पड़ेगा.
ग्रामीणों का कहना है कि अब वे आश्वासन नहीं, बल्कि सड़क निर्माण की ठोस पहल चाहते हैं. उनका कहना है कि जरूरत पड़े तो उनसे सहयोग लिया जाए, लेकिन गांव तक पक्की सड़क जरूर बनायी जाए.
