झारखंड की पारंपरिक कला और स्थानीय हुनर को स्वरोजगार से जोड़ने की पहल पिंड्राजोरा में शुरू हुई है. पर्यावरण संरक्षण के साथ सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हुए महिलाओं के लिए आजीविका के अवसर तैयार करने के उद्देश्य से रविवार को सिक्की कला पर पांच दिवसीय क्षमता निर्माण प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हुआ. प्रशिक्षण का विषय ‘सिक्की कला : सतत आजीविका एवं सांस्कृतिक संरक्षण की ओर’ है. कार्यक्रम चार सितंबर तक चलेगा.
आइआइटी-आइएसएम की ओर से हुआ आयोजन
झारखंड फाउंडेशन केंद्र के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन पर्यावरण विज्ञान एवं अभियांत्रिकी विभाग, आइआइटी (आइएसएम) धनबाद के इआइएसीपी प्रोग्राम सेंटर की ओर से पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वावधान में किया जा रहा है.
पारंपरिक हुनर बनेगा रोजगार का जरिया
प्रशिक्षण का उद्घाटन विभागाध्यक्ष प्रो. आलोक सिन्हा, प्रो. सुनील कुमार गुप्ता, प्रो. सुरेश पांडियन और पिंड्राजोरा पंचायत के पूर्व मुखिया गोरा चांद महतो ने किया. प्रो. आलोक सिन्हा ने कहा कि पारंपरिक कला और कौशल को प्रोत्साहन देकर स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा किये जा सकते हैं.
उन्होंने बताया कि प्रशिक्षुओं को आइआइटी (आइएसएम) धनबाद के प्रमुख आयोजनों में स्टॉल लगाकर अपने सिक्की कला उत्पादों की प्रदर्शनी का अवसर भी दिया जायेगा. इससे उत्पादों को बाजार और संभावित खरीदारों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी.
30 प्रतिभागी सीखेंगे उत्पाद बनाने का कौशल
प्रशिक्षण में 30 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया है. इनमें जेएसएलपीएस से जुड़े स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं और गृहिणियां शामिल हैं. प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को सिक्की कला के व्यावहारिक कौशल, उत्पाद निर्माण, गुणवत्ता सुधार और बाजार की संभावनाओं की जानकारी दी जायेगी.
दिलायी गयी मिशन लाइफ की शपथ
कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को मिशन लाइफ की शपथ भी दिलायी गयी. प्रशिक्षण के समापन पर बेहतर प्रदर्शन करने वाले तीन प्रशिक्षुओं को सम्मानित किया जायेगा. मौके पर दीपक कुमार महतो, अंगद कुमार महतो, मीना देवी और संजीव कुमार मौजूद थे.
