एक समय गली-मोहल्ले, बाजार और सरकारी दफ्तर के बाहर लाल रंग की डाकपेटी क्षेत्र की पहचान हुआ करती थी. नौकरी के आवेदन, परीक्षा फॉर्म, पारिवारिक चिट्ठियां, राखी, शुभकामना संदेश और सरकारी पत्र लोग इन्हीं डाकपेटियों में डालते थे. लेकिन सोशल मीडिया के जमाने में अब ये डाकपेटियां पुरानी बात हो गयी हैं. आज भी कई स्थानों पर वर्षों पुराने डाकपेटी मौजूद हैं, लेकिन उनकी हालत उपेक्षा की कहानी बयां कर रही है. कहीं उन पर जंग की मोटी परत चढ़ गयी है, तो कहीं रंग उड़ चुका है. कई डाकपेटी झाड़ियों और घास के बीच खड़ी हैं. इन्हें देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि अब इनका उपयोग पहले जैसा नहीं रहा. हालांकि, डाक विभाग की यह व्यवस्था पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है. आज भी इन डाकपेटियों से नियमित रूप से साधारण डाक निकाली जाती है. इन पर अंतिम निकासी का समय भी अंकित है. डिजिटल माध्यमों के बढ़ते उपयोग से साधारण चिट्ठियों की संख्या पहले की तुलना में घटी है, लेकिन डाकपेटियों की उपयोगिता अभी भी बनी हुई है. आज भी साधारण डाक, आवेदन पत्र और अन्य पत्राचार के लिए लोग लेटर बॉक्स का उपयोग कर रहे हैं. अनूप कुमार, सहायक डाक अधीक्षक बोकारो
डाकपेटियां : कहीं जंग की मोटी परत जमी, कहीं उड़ गया है रंग
बोकारो में पुरानी लाल डाकपेटियां अब उपेक्षा का शिकार हैं। कहीं जंग लगी है तो कहीं रंग उड़ गया है, फिर भी डाक विभाग इनका उपयोग कर रहा है। पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

06,07,08 | Prabhat Khabar Network