कसमार. कभी खेती और वनोपज के सहारे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाला कसमार प्रखंड का हिसीम पहाड़ अब बंदरों के बढ़ते उत्पात से परेशान है. पहाड़ पर बसे हिसीम, केदला, त्रियोनाला और गुमनजारा चार राजस्व गांवों में पिछले करीब एक दशक में बंदरों की संख्या बढ़ने के साथ फसलों को नुकसान भी बढ़ा है. हालात यह हैं कि कई किसानों ने दलहन और तिलहन समेत कई फसलों की खेती कम कर दी है, जबकि बड़ी संख्या में खेत खाली पड़े हैं.
फसल तैयार होते ही पहुंच जाता है बंदरों का झुंड
ग्रामीणों के अनुसार, बंदर जंगल से निकलकर झुंड में खेतों तक पहुंचते हैं. किसान बुआई से लेकर फसल तैयार होने तक मेहनत करते हैं, लेकिन पौधों में बालियां या फल आने के समय बंदरों का झुंड खेतों में पहुंच जाता है. इससे फसल को काफी नुकसान होता है.
छोटे किसानों के लिए हर समय खेत की निगरानी करना संभव नहीं है. बार-बार फसल बर्बाद होने से किसानों का खेती के प्रति भरोसा भी कम हुआ है. खासकर दलहन और तिलहन की खेती इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है. किसानों का कहना है कि बीज, मजदूरी और दूसरी लागत लगाने के बाद यदि फसल ही बर्बाद हो जाये, तो खेती घाटे का सौदा बन जाती है.
खेती घटी तो ग्रामीणों की आय पर पड़ा असर
खेती का दायरा सिमटने का असर ग्रामीण परिवारों की आमदनी पर भी पड़ा है. पहले खेत से मिलने वाला अनाज परिवार की जरूरतें पूरी करता था. वहीं दलहन और तिलहन जैसी फसलों की अतिरिक्त उपज बेचकर ग्रामीण आमदनी भी करते थे.
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अब इन फसलों का उत्पादन कम होने से परिवारों को बाजार से अधिक सामान खरीदना पड़ रहा है. खेती कम होने से कृषि मजदूरी के अवसर भी घट रहे हैं. इससे स्थानीय स्तर पर उपज की खरीद-बिक्री से जुड़ा कारोबार प्रभावित हो रहा है.
ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ फसल का नुकसान नहीं है, बल्कि उनकी आजीविका के एक पुराने आधार का कमजोर होना है. वनोपज अभी भी ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन केवल वनोपज के सहारे परिवार की सभी जरूरतें पूरी करना आसान नहीं है.
चारों गांवों में बंदरों का उत्पात
केदला निवासी झामुमो नेता एवं बीस सूत्री समिति के प्रखंड अध्यक्ष दिलीप कुमार हेंब्रम ने कहा कि बंदरों का उत्पात किसी एक गांव तक सीमित नहीं है. हिसीम पहाड़ के लगभग सभी चार राजस्व गांव इससे प्रभावित हैं. समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है. इस संबंध में वन विभाग के वरीय अधिकारियों को भी जानकारी दी गयी है.
हिसीम निवासी भाजपा नेता एवं केंद्रीय वन पर्यावरण सुरक्षा सह प्रबंधन समिति के कोषाध्यक्ष आनंद कुमार महतो ने कहा कि बंदरों ने पहाड़ की खेती-बारी को काफी नुकसान पहुंचाया है. धान को छोड़ दें तो अधिकांश फसलों की खेती ग्रामीणों को बंदरों के कारण छोड़नी पड़ी है. धान की फसल को भी बंदरों से नुकसान होता है.
वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाये बिना समाधान की मांग
ग्रामीणों के सामने अब दोहरी चुनौती है. वे अपनी खेती और आय का स्रोत बचाना चाहते हैं, साथ ही जंगल और वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर भी संवेदनशील हैं. ग्रामीणों का कहना है कि बंदरों की समस्या का समाधान ऐसा होना चाहिए, जिससे किसानों की फसल भी बचे और वन्यजीवों को भी नुकसान न पहुंचे.
ग्रामीण वन विभाग से बंदरों के बढ़ते उत्पात का अध्ययन कराने और फसल बचाने के व्यावहारिक उपाय तलाशने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि किसानों को तकनीकी सहायता और फसल सुरक्षा के प्रभावी उपाय उपलब्ध कराये जाने चाहिए.
ग्रामीणों का कहना है कि समय रहते पहल नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में हिसीम पहाड़ के चारों गांवों में खेती का दायरा और सिमट सकता है. इसका सीधा असर ग्रामीण परिवारों की आय और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.
