Jharkhand High Court, रांची, (राणा प्रताप की रिपोर्ट): झारखंड उच्च न्यायालय ने बोकारो जिले के पिंडराजोरा थाना क्षेत्र से एक 14 वर्षीय नाबालिग के लापता होने के मामले में बोकारो पुलिस की कार्यशैली पर बेहद तल्ख टिप्पणी की है. जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पुलिस की विफलताओं को उजागर करते हुए सवाल किया कि आखिर लापता मामलों में बोकारो पुलिस के हाथ हमेशा खाली क्यों रह जाते हैं?
हाईकोर्ट ने अधिकारियों की गंभीरता पर उठाए सवाल
अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि बोकारो के पूर्व व वर्तमान पुलिस अधीक्षक (SP) और डीएसपी लापता होने वाले मामलों के खुलासे पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहे हैं. खंडपीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा – ”पुलिस स्वयं मान रही है कि यह अपहरण का मामला हो सकता है, लेकिन जांच उस दिशा में नहीं की जा रही है. दो बेंचों की खंडपीठ ने नार्को टेस्ट में पुलिस पर लापरवाही बरतने का भी दावा किया. उन्होंने ने कहा कि 2020 में दर्ज इस प्राथमिकी में तीन लोगों का नार्को टेस्ट होना था, लेकिन एक व्यक्ति को खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर छोड़ दिया गया. कोर्ट ने यहां तक कहा दिया कि बोकारो पुलिस की विफलता को छिपाने के लिए केस को अप्रैल 2026 में सीआईडी (CID) को हस्तांतरित कर दिया गया.
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CBI जांच की दी चेतावनी
सीआईडी की केस डायरी का अध्ययन करने के बाद खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि वर्तमान अनुसंधान सही दिशा में नहीं है. कोर्ट ने सीआईडी को अगले तीन सप्ताह के भीतर जांच में ठोस प्रगति दिखाने का निर्देश दिया. अदातल ने कहा कि यदि सीआईडी की जांच संतोषजनक नहीं पाई गई, तो अदालत राज्य एजेंसी और सीबीआई (CBI) को संयुक्त रूप से जांच करने का आदेश दे सकती है.
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला 16 अक्तूबर 2020 का है, जब एक 14 वर्षीय किशोरी लापता हो गई थी. उसकी मां ने पिंडराजोरा थाना में कांड संख्या 161/2020 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई थी. बेटी का सुराग न मिलने पर मां ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर उसे बरामद करने की गुहार लगाई है. मामले की अगली सुनवाई अब 8 जून को होगी.
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