तेनुघाट डैम से बोकारो इस्पात संयंत्र (बीएसएल) और लाखों की आबादी तक पानी पहुंचाने वाली 34.5 किमी लंबी तेनुघाट-बोकारो नहर जगह-जगह जर्जर हो गयी है. इस पर बड़ा खतरा मंडरा है. लगभग 51 साल पुरानी इस नहर के जर्जर होने से पानी की बर्बादी हो रही है. साथ ही इसके किनारे बसे गांवों पर भी खतरा रहता है. दरकती दीवारें और जमा सिल्ट (कीचड़ और पत्थर) के कारण नहर की स्थिति खराब है. कई स्थानों पर इसकी कंक्रीट की परत पूरी तरह उखड़ चुकी है. सफाई नहीं होने के कारण नहर की जल धारण क्षमता काफी कम हो गयी है. नहर की दीवारों में आयी दरारों के कारण पानी का भारी रिसाव हो रहा है और आसपास के खेतों में जलजमाव हो जाता है. इससे किसानों की फसलें बर्बाद हो जाती है.
हर साल मरम्मत पर खर्च होता है करोड़ों रुपया
नहर की मरम्मत के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है. दिसंबर 2025 में विभाग द्वारा करीब 4.60 करोड़ रुपये की लागत से इसकी मरम्मत करायी गयी है. स्थानीय ग्रामीणों और विस्थापित नेताओं का आरोप है कि यह मरम्मत कार्य केवल औपचारिकता है. हर साल करोड़ों रुपये इसकी मरम्मत के नाम पर बहाये जाते हैं. लेकिन गुणवत्ता खराब होने के कारण पहली बारिश में ही स्थिति फिर वही हो जाती है. जब तक पूरी नहर का कायाकल्प नहीं होगा, तब तक यह समस्या बनी रहेगी.
बड़ा कटाव होने पर बीएसएल और चास पर सीधा असर
अगर नहर में बड़ा कटाव होता है तो बीएसएल प्लांट के कूलिंग पौंड में पानी की कमी हो सकती है और इससे प्लांट के उत्पादन पर असर पड़ सकता है. इसके अलावा चास नगर निगम और प्लांट के टाउनशिप में जलापूर्ति ठप हो सकती है. नहर का सर्विस रोड भी जर्जर हो चुका है. यह रोड बेरमो अनुमंडल और बोकारो जिला मुख्यालय को जोड़ता है.
ठोस योजना पर काम करने की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि पैचवर्क के बजाय पूरी नहर की लाइनिंग फिर से करने की जरूरत है. वर्षों से जमा कीचड़ को निकाला जाये, ताकि पानी का प्रवाह सुचारू हो सके. नहर की दीवारों को असामाजिक तत्वों से बचाने और नियमित निगरानी के लिए विशेष दस्ता तैनात हो. प्रशासन और बीएसएल प्रबंधन को मिल कर ठोस योजना पर काम करने की जरूरत है.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
