BSL पर अशोक चौधरी का निशाना, बोले- गेट पास वैध और घर अवैध; यह कैसी नीति

जद(यू) नेता अशोक चौधरी ने बोकारो स्टील प्रबंधन के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाए हैं, जहां ठेका मजदूरों के गेट पास वैध हैं लेकिन उनके आवासों को अवैध माना जाता है। उन्होंने विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के मुद्दे को भी उठाया है.

बोकारो. जद(यू) के वरिष्ठ नेता और पूर्व बियाडा चेयरमैन अशोक चौधरी ने बीएसएल के ठेका मजदूरों से जुड़े आवास और अतिक्रमण के मुद्दे पर बोकारो स्टील प्रबंधन की नीतियों पर सवाल उठाया है. मंगलवार को उन्होंने कहा कि बीएसएल में काम करने वाले हजारों ठेका मजदूरों के पास प्लांट में प्रवेश के लिए वैध गेट पास हैं, लेकिन जिन बस्तियों में वे रहते हैं, उन्हीं आवासों को प्रबंधन अवैध या अतिक्रमण मानता है.

जद(यू) के वरिष्ठ नेता और पूर्व बियाडा चेयरमैन अशोक चौधरी सहित अन्य लोग

अशोक चौधरी ने कहा कि बीएसएल के मुख्य गेट पास अनुभाग से करीब 20 से 22 हजार ठेका मजदूरों के लिए अलग-अलग टेंडर अवधि के अनुसार आरएफआईडी गेट पास बनाये या नवीनीकृत किये जाते हैं. ये मजदूर मेंटेनेंस, सिविल वर्क, ट्रांसपोर्टेशन, ऑपरेशन सपोर्ट, जेवी प्रोजेक्ट, मॉडर्नाइजेशन, स्क्रैप हैंडलिंग, क्लीनिंग, हाउसकीपिंग, कैंटीन, लॉजिस्टिक्स, लोडिंग-अनलोडिंग, इलेक्ट्रिकल, प्लंबिंग और सिविल रिपेयर समेत विभिन्न कार्यों में अपनी सेवाएं देते हैं.

जिन पतों पर गेट पास, वही क्षेत्र प्रबंधन की नजर में अतिक्रमण

चौधरी ने कहा कि बड़ी संख्या में ठेका मजदूरों के गेट पास पर बोकारो क्षेत्र की विभिन्न बस्तियों के पते दर्ज हैं. इनमें दुंदीबाद झोपड़पट्टी, लकड़ी गोला, माराफारी, बसंती मोड़, सेक्टर-1 की झोपड़ियां, झोपड़ी कॉलोनी, रानीपोखर, चौफान और रामडीह समेत अन्य इलाके शामिल हैं.

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उन्होंने आरोप लगाया कि इन इलाकों को बीएसएल प्रबंधन अतिक्रमण क्षेत्र मानता है. उनके अनुसार, एक ओर इन्हीं मजदूरों के श्रम से प्लांट का उत्पादन सुचारु रूप से चलता है, जबकि प्लांट से बाहर निकलने के बाद उन्हें अतिक्रमणकारी के तौर पर देखा जाता है.

"गेट पास वैध और घर अवैध, यह कैसी नीति"

अशोक चौधरी ने कहा कि बीएसएल प्रशासन समय-समय पर इन इलाकों में सुरक्षा बल भेजकर नये निर्माण को हटाता है और उन्हें अवैध निर्माण बताता है. उन्होंने कहा, "गेट पास वैध और घर अवैध, यह सरासर प्रबंधन की गलत नीतियों की ओर इंगित करता है."

उन्होंने कहा कि प्लांट में काम करने वाले हजारों ठेका मजदूरों को बीएसएल या संबंधित ठेकेदारों की ओर से आधिकारिक आवास उपलब्ध नहीं कराया जाता. कम वेतन के कारण कई मजदूर किराये का मकान लेने की स्थिति में नहीं हैं. ऐसे में वे झोपड़ी या कच्चे मकान में रहने को मजबूर हैं.

विस्थापित परिवारों के पुनर्वास का मुद्दा भी उठाया

अशोक चौधरी ने कहा कि बोकारो स्टील प्लांट के लिए जिन लोगों के पूर्वजों की जमीन ली गयी थी, उनमें से विस्थापित बस्तियों के कई परिवारों को अब तक पुनर्वास या नियोजन का लाभ नहीं मिला है. उन्होंने कहा कि पिछले तीन-चार दशकों से इन इलाकों को अतिक्रमणकारी मानकर नीतियां बनायी जाती रही हैं.

उनके अनुसार, इसका असर शहर की व्यवस्था पर भी पड़ रहा है और कई इलाकों में अव्यवस्था, गंदगी और असुरक्षा जैसी समस्याएं बनी हुई हैं.

प्रबंधन से नजरिया बदलने की मांग

अशोक चौधरी ने बोकारो स्टील प्रबंधन से अपनी नीतियों और नजरिये में बदलाव लाने की मांग की. उन्होंने कहा कि इन लोगों को केवल अतिक्रमणकारी के रूप में देखने के बजाय उनकी सामाजिक और श्रमिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में पहल होनी चाहिए.

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उन्होंने बीएसएल प्रबंधन से जिला प्रशासन, राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और मजदूर यूनियनों के साथ बैठक कर वर्षों पुरानी समस्या के समाधान के लिए समग्र योजना तैयार करने की मांग की. चौधरी ने कहा कि ठेका मजदूरों और विस्थापित परिवारों से जुड़े आवास, पुनर्वास और नागरिक सुविधाओं के मुद्दे का स्थायी समाधान तलाशने की जरूरत है.

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By Sunil tiwari

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