झामुमो के गठन का उद्देश्य था, झारखंड अलग राज्य निर्माण. आंदोलन में सभी वर्ग के लोगों को जोड़ कर इसमें नयी जान फूंकी जा सके. इससे पहले महाजनी प्रथा से त्रस्त संताल समाज के लोगों की दयनीय हालत में सुधार लाने के लिए दिशोम गुरु स्व शिबू सोरेन सक्रिय थे. इससे पहले झारखंड राज्य आंदोलन को व्यापक रूप देने और पहचान दिलाने वाले जयपाल सिंह मुंडा और एनई होरो के नेतृत्व वाली झारखंड पार्टी और हुल झारखंड पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया था. इसके बाद आंदोलन लगभग ठप सा हो गया था, लेकिन झामुमो ने उसे नयी धार दी.
वर्ष 1980 में झामुमो को विधानसभा चुनाव में 11 सीटें तथा लोकसभा चुनाव में दो सीटें (एके राय व शिबू सोरेन) मिली. 1983-84 में झामुमो दो गुट में बंट गया. एक गुट के अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो व महासचिव टेकलाल महतो और दूसरे गुट के अध्यक्ष निर्मल महतो, महासचिव शिबू सोरेन, उपाध्यक्ष सूरज मंडल बने. 1987 में निर्मल महतो की हत्या के बाद दोनों गुट फिर से एक हो गये. 1989 के लोकसभा चुनाव में झामुमो के कुल तीन सांसद थे, जबकि 19 विधायक हुआ करते थे. 1991 के लोकसभा चुनाव में झामुमो के छह सांसद हो गये. 1992 में एक बार फिर से झामुमो में बिखराव हुआ. शिबू सोरेन 10 विधायक व चार सांसद के साथ अलग हो गये. दूसरे गुट के नेता कृष्णा मार्डी दो सांसद व नौ विधायक के साथ अलग हो गये. लेकिन वर्ष 1999 में झामुमो के कुछ पुराने नेताओं की पहल से झामुमो का एक बार फिर से एकीकरण हुआ.ये हैं बेरमो के पुराने झामुमो नेता
बेरमो में वर्ष 1965 के आसपास झारखंड आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू हो गयी थी. बेरमो के पुराने झामुमो नेताओं में जरीडीह बस्ती के स्व काली ठाकुर, ढोरी बस्ती के स्व युगल किशोर महतो, छठु महतो, चार नंबर के स्व मोहर महतो थे. जरीडीह बाजार के धनेश्वर महतो ने आज भी क्षेत्र में झामुमो की कमान संभाल रखी है. स्व काली ठाकुर पार्टी के पहले बेरमो प्रखंड अध्यक्ष बने थे. लंबे समय तक झामुमो के सचिव रहे.
