बेरमो : 27 नवंबर को बनारस में जेबीसीसीआइ मानकीकरण कमेटी की बैठक प्रबंधन ने बुलायी है. इस बैठक में कोल इंडिया प्रबंधन के अलावा विभिन्न कोल कंपनियों के निदेशक व चारों श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहेंगे. बैठक में मुख्य रूप से कोल कर्मियों के मेडिकल अनफिट बंद होने का मामला छाया रहेगा. रिटायर कोल कर्मियों के लिए पोस्ट मेडिकल रिटायमेंट बेनिफिट का मामला भी उठेगा. श्रमिक संगठनों के अनुसार इस मामले को लेकर अभी तक ट्रस्ट नहीं बना है. ना तो रजिस्ट्रेशन हो रहा है और ना ही रिटायर कर्मियों का मेडिकल कार्ड बन रहा है.
प्रबंधन द्वारा जारी पत्र के अनुसार कोल इंडिया में अब कर्मियों की मृत्यु पर ही आश्रित को कैटेगरी वन में नौकरी दी जायेगी. कार्मिक निदेशक आरपी श्रीवास्तव के हस्ताक्षर से इस आशय का आदेश दो दिन पहले जारी किया गया था. मालूम हो कि अभी तक मृत्यु के अलावा कोल मेडिकल अनफिट, फीमेल वीआरएस स्कीम के तहत भी आश्रित को नियोजन मिलता रहा है.
कोल इंडिया डीपी आरपी श्रीवास्तव के अनुसार प्रबंधन के साथ हुई बैठक में यूनियनों की सहमति के बाद ही सर्कुलर जारी हुआ है. प्रबंधन के अनुसार बैठक में मतभेद संबंधी बातों पर बनारस की बैठक में विस्तार से चर्चा होगी.
प्रबंधकीय आदेश का विरोध : इधर, प्रबंधकीय आदेश का चौतरफा विरोध शुरू हो गया है. एटक नेता रमेंद्र कुमार व लखनलाल महतो, एचएमएस नेता नाथुलाल पांडेय व सीटू नेता डीडी रामानंदन का कहना है कि नियोजन के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा. प्रबंधन को हर हाल में यह निर्णय वापस लेना होगा. एटक, सीटू, एचएमएस ने प्रबंधन को कड़ा पत्र लिख कर इस मामले में विरोध किया है. इनका कहना है कि कोलकर्मियों के नियोजन के लिए पहले से चली आ रही धारा (9:30, 9:4:0,9:5:0) को प्रबंधन कैसे बंद कर सकता है.
कोल इंडिया में लंबित हैं मेडिकल अनफिट के करीब छह हजार मामले
कोलकर्मियों के शारीरिक अस्वस्थता के बाद अपने आश्रित पुत्र को नियोजन देने का प्रावधान एनसीडब्ल्यू-2 से चला आ रहा है. वर्ष 1998-99 में मेडिकल अनफिट (9:4:0) के सबसे ज्यादा मामलों का निष्पादन हुआ. 2001-02 तक इस स्कीम का लाभ मजदूरों ने उठाया. इसके बाद 2016 तक गिने-चुने मामलों में ही मेडिकल अनफिट के तहत आश्रित पुत्र को नियोजन मिला.
अब प्रबंधन ने पूर्ण रूप से इस योजना को बंद कर दिया. कोल इंडिया प्रबंधन ने वर्ष 1996 में मेडिकल अनफिट के मामले में किसी कर्मी के छह गंभीर रोग से पीड़ित होना आवश्यक बताया था. इसमें अंधापन, किडनी, कैंसर, लकवा, हार्ट आदि गंभीर रोगों को इसमें शामिल किया गया. मजदूर संगठनों के दवाब के बाद प्रबंधन ने इसे वापस ले लिया. वर्ष 2008 में प्रबंधन ने फिर से मेडिकल अनफिट के केस में इन छह रोगों को अनिवार्य कर दिया. पिछले कई वर्षों से कोल इंडिया की किसी भी कंपनी में मेडिकल अनफिट (9:4:0) के तहत नियोजन बंद है. सीसीएल में जून 2016 से मेडिकल बोर्ड पूरी तरह से बंद है. इसके कारण मेडिकल अनफिट (9:4:0) के सैकड़ों मामले लंबित हैं.
क्या फैसला लिया गया था दसवें वेजबोर्ड में
पहले यह समझौता था कि मेडिकल अनफिट के केस में किसी भी कोलकर्मी को छह माह तक हर माह आधा वेतन दिया जायेगा. एनसीडब्ल्यू-10 में एग्रीमेंट किया गया कि जब तक किसी कर्मी को मेडिकल बोर्ड द्वारा मेडिकल अनफिट पूरी तरह से घोषित नहीं कर दिया जाता है, तब तक उसे हर माह आधा वेतन मिलता रहेगा. 9:3:0, 9:4:0 एवं 9:5:0 के लिए दसवां वेतन समझौता में एक ड्राफ्टिंग कमेटी का गठन किया गया था. इस कमेटी को इन तीनों धाराओं के तहत आश्रितों को मिलने वाले नियोजन को लेकर किसी नतीजे पर पहुंचना था.
