Bihar Flood : यह तस्वीर किसी दूर-दराज के पहाड़ी इलाके या किसी दूसरे देश की नहीं है. यह तस्वीर राजधानी पटना से महज 30 किलोमीटर दूर राघोपुर की है. वही राघोपुर, जहां से बिहार विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव विधायक हैं. बाढ़ के पानी ने यहां कई परिवारों की जिंदगी मुश्किल कर दी है. घरों में पानी घुस चुका है और कई परिवारों को अपना आशियाना छोड़कर सुरक्षित जगहों की तलाश करनी पड़ रही है.
प्रभात खबर की टीम जब राघोपुर पहुंची, तो बाढ़ के बीच जिंदगी की ऐसी तस्वीरें कैमरे में कैद हुईं, जो सरकार और प्रशासन के दावों पर सवाल खड़े करती हैं. किसी का घर पानी में डूब चुका है, तो किसी के घर का सामान बाढ़ की भेंट चढ़ गया है. कई लोग राहत और मदद का इंतजार कर रहे हैं.
बाढ़ ने छीना आशियाना, मंदिर बना सहारा
बाढ़ की सबसे दर्दनाक तस्वीर उस परिवार की सामने आई, जिसका घर पूरी तरह पानी में डूब चुका है. घर छोड़ने के बाद परिवार ने मंदिर में शरण ली है. सिर छिपाने के लिए यही जगह अब उनका सहारा है.
परिवार के पास खाने के लिए पर्याप्त राशन भी नहीं है. हाथ में एक काली पॉलीथिन दिखाई देती है, जिसमें चूड़ा रखा हुआ है. यही चूड़ा फिलहाल परिवार के लिए भोजन का सहारा बना हुआ है. जिस चूड़े को आम तौर पर लोग स्वाद के लिए खाते हैं, वही बाढ़ पीड़ितों के लिए मजबूरी का भोजन बन गया है.
ग्रामीणों का सवाल- आखिर हमारी सुध कौन लेगा?
राघोपुर के ग्रामीणों का कहना है कि हर साल बाढ़ आती है और हर बार उन्हें इसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है. पानी बढ़ते ही घरों में घुस जाता है और लोगों के सामने रहने तथा खाने का संकट खड़ा हो जाता है.
ग्रामीणों के मुताबिक, इस बार भी कई परिवारों को पर्याप्त राहत नहीं मिली है. लोगों का सवाल है कि जब घरों में पानी घुस चुका है और खाने के लिए राशन तक उपलब्ध नहीं है, तो उनकी मदद के लिए प्रशासन कब पहुंचेगा?
घर डूबा तो मंदिर में पहुंचे लोग, अब मंदिर पर भी खतरा
बाढ़ का पानी लगातार बढ़ने से लोगों की चिंता और बढ़ गई है. जिन परिवारों ने घर छोड़कर मंदिर में शरण ली है, उन्हें अब इस बात का डर सता रहा है कि अगर पानी मंदिर तक पहुंच गया तो वे कहां जाएंगे.
एक ग्रामीण ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि घर में पानी घुस चुका है और रहने की कोई दूसरी जगह नहीं है. ऐसे में मंदिर ही फिलहाल उनका सहारा है.
सांसद मंत्री, विधायक नेता प्रतिपक्ष, फिर भी बदहाल राघोपुर
राघोपुर राजनीतिक रूप से बिहार की महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों में शामिल है. यहां से तेजस्वी यादव विधायक हैं और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं. इलाके के लोगों को अपने जनप्रतिनिधियों से काफी उम्मीदें हैं.
वहीं, ग्रामीण यह सवाल भी उठा रहे हैं कि जब उनका इलाका राजधानी पटना से महज करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर है और यहां से जुड़े जनप्रतिनिधि सत्ता और राजनीति के महत्वपूर्ण पदों पर हैं, तो बाढ़ की इस घड़ी में उनकी परेशानी दूर करने के लिए पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं दिख रही है.
राजधानी के इतने करीब, फिर भी मदद का इंतजार
राघोपुर की दूरी राजधानी पटना से बहुत ज्यादा नहीं है. पटना वही जगह है जहां से राज्य की सरकार चलती है और जहां बैठकर बाढ़ तथा आपदा प्रबंधन की लगातार समीक्षा की जाती है.
लेकिन राघोपुर में बाढ़ पीड़ित परिवारों की तस्वीरें एक अलग कहानी कह रही हैं. लोगों के घर डूब चुके हैं और कई परिवार सुरक्षित ठिकाने की तलाश में हैं. ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें अब सिर्फ सरकारी मदद का इंतजार है.
चूड़ा के सहारे गुजर रही जिंदगी
बाढ़ के बीच सबसे बड़ा संकट भोजन का है. जिन परिवारों के घर पानी में डूब गए हैं, उनके सामने रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है.
एक महिला के हाथ में मौजूद काली पॉलीथिन में रखा चूड़ा इस संकट की पूरी कहानी बयां करता है. उनके लिए यह कोई पसंद का भोजन नहीं, बल्कि मजबूरी है. जब घर में चूल्हा जलाने की स्थिति नहीं हो और राशन उपलब्ध नहीं हो, तब चूड़ा ही पेट भरने का सहारा बन जाता है.
ग्रामीणों में नाराजगी, बोले- पूछने वाला कोई नहीं
राघोपुर में प्रभात खबर की टीम से बातचीत के दौरान कुछ ग्रामीणों में व्यवस्था को लेकर नाराजगी भी दिखाई दी. उनका कहना था कि बाढ़ के दौरान हर साल यही स्थिति बनती है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में अपेक्षित काम नहीं हुआ.
ग्रामीणों की शिकायत है कि बाढ़ के पानी के बीच उनकी परेशानी जानने और राहत की स्थिति देखने के लिए जिम्मेदार लोग समय पर नहीं पहुंचते. ऐसे में लोगों के बीच नाराजगी बढ़ रही है.
अब सवाल सरकार और जनप्रतिनिधियों से
राघोपुर की इन तस्वीरों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बाढ़ से परेशान लोगों की आवाज सरकार और जनप्रतिनिधियों तक पहुंचेगी?
क्या बाढ़ पीड़ित परिवारों तक पर्याप्त भोजन, राहत सामग्री और सुरक्षित आश्रय पहुंचाया जाएगा? क्या हर साल आने वाली इस समस्या का कोई स्थायी समाधान निकलेगा?
राघोपुर के लोगों ने जिन जनप्रतिनिधियों को अपना वोट देकर चुना है, उनसे उनकी उम्मीदें भी जुड़ी हैं. ऐसे में बाढ़ की यह तस्वीरें उन उम्मीदों और व्यवस्था दोनों की परीक्षा ले रही हैं.
एक उम्मीद पर टिकी है जिंदगी
बाढ़ ने इन परिवारों से उनका घर, सामान और सामान्य जिंदगी छीन ली है. अब उनके पास बची है तो सिर्फ उम्मीद. उम्मीद कि पानी कम होगा, घर वापस रहने लायक होगा और सरकार तथा प्रशासन उनकी मदद के लिए आगे आएगा.
राघोपुर की ये तस्वीरें सिर्फ बाढ़ की कहानी नहीं हैं. यह उन परिवारों की कहानी है, जिनका आशियाना पानी में डूब चुका है और जो फिलहाल मंदिर जैसे अस्थायी ठिकानों पर जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं.
अब देखना यह है कि कैमरे में कैद इन तस्वीरों और ग्रामीणों की आवाज का असर जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों तक कितना पहुंचता है. क्या इन परिवारों को राहत मिलेगी या फिर हर साल की तरह इस बार भी बाढ़ का पानी उतरने का इंतजार ही उनकी नियति बनी रहेगी?