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Valmiki Tiger Reserve Tiger Death : बेतिया/पश्चिम चंपारण : बिहार के इकलौते अभ्यारण्य वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (VTR) में एक बाघ की मौत हो गई. यह मौत सामान्य नहीं है. बाघों के संरक्षण के लिहाज से बिहार का गौरव कहे जाने वाले इस VTR में हुई ये मौत सवालों के घेरे में है. इस घटना ने न सिर्फ बाघ प्रेमियों को भी झकझोर दिया है बल्कि वीटीआर प्रशासन और वन्य जीव संरक्षण के सरकार के दावे की भी हवा निकाल दी है. सवाल ये है कि अभ्यारण्य में ये क्या हो रहा है कि एक पूर्ण विकसित बाघ की मौत हो रही है?
अभ्यारण्य में करंट के तार!
बाघ की मौत का कारण करंट लगना बताया जा रहा है. जो स्वाभाविक तो नहीं है खासकर ऐसी जगह जो जानवरों के संरक्षण के लिए बनाई और तैयार की गई है. मिली जानकारी के अनुसार, एक वयस्क बाघ की मौत मांगूरहा वन क्षेत्र में हुई है. यह घटना महज एक ‘दुर्घटना’ नहीं, बल्कि वन विभाग की अक्षमता और लापरवाही का जीवंत प्रमाण है.
लापरवाह वन्य प्रशासन
नियम स्पष्ट हैं, टाइगर रिजर्व के बफर जोन है. इसके आसपास के संवेदनशील इलाकों में नंगे बिजली के तार बिछाना न केवल अवैध है, बल्कि एक दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है. इसे हटाने या हटवाने का काम वन्य विभाग, रेंजर्स और गश्ती दल की होती है. ऐसे सवाल यह उठता है कि आखिर वन्य जीव संरक्षण के अधिकारी और गश्ती दल के लोग कहां थे?
क्या नहीं थी बाघ की मौजूदगी की जानकारी?
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि बाघ के चहलकदमी की जानकारी वीटीआर को होती है. उसकी मूवमेंट पर निगाह रखने की जिम्मेदारी तय की गई है. इतना ही नहीं अभ्यारण्य में बाघों के मूवमेंट वाले इलाके में किसी तरह के नंगे बिजली के तार जाल आदि लगाना पर पाबंदी है. ऐसे में जो कहा जा रहा है कि बाघ की मौत बिजली का करंट लगने से हुई है, ये वन्य विभाग के तमाम अधिकारियों और कार्यशैली पर सवाल उठाने के लिए काफी है.
क्या कर रहा था गश्ती दल?
इलाके में बाघ की चहलकदमी दर्ज की जा रही थी, तो वन विभाग की गश्ती टीम क्या कर रही थी? क्या अधिकारियों को इस बात की भनक नहीं थी कि ग्रामीण अपनी फसलों के बचाव के नाम पर खेतों में मौत का जाल (इलेक्ट्रिक फेंसिंग) बिछा रहे हैं? यदि नहीं तो यह सवाल बिहार सरकार के वन्य जीव संरक्षण के अभियान पर है. जिसके बलबूते वो बिहार में टूरिज्म को बढ़ावा देने का सपना देख रहा है.
इलाके में बाघ की चहलकदमी दर्ज की जा रही थी, तो वन विभाग की गश्ती टीम क्या कर रही थी? क्या अधिकारियों को इस बात की भनक नहीं थी कि ग्रामीण अपनी फसलों के बचाव के नाम पर खेतों में मौत का जाल (इलेक्ट्रिक फेंसिंग) बिछा रहे हैं? यदि नहीं तो यह सवाल बिहार सरकार के वन्य जीव संरक्षण के अभियान पर है. जिसके बलबूते वो बिहार में टूरिज्म को बढ़ावा देने का सपना देख रहा है.
जिम्मेदारी किसकी, केवल कागजी लफबाजी?
वन्यजीव विशेषज्ञ और वीटीआर से जुड़े अधिकारी के अनुसार, अभयारण्य क्षेत्र के आसपास बिजली के अवैध तारों को हटाने, हटवाने और ग्रामीणों को जागरूक करने की पूरी जिम्मेदारी वन विभाग और स्थानीय प्रशासन की होती है. यदि वन विभाग ऐसा नहीं करता तो जिम्मेदार इन्हीं अधिकारियों की बनती है. ऐसे में इस बाघ की मौत ने बिहार की शान वीटीआर के रेंजर्स के कार्य प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
सवाल
क्या निगरानी का अभाव था? : अगर बाघ जंगल से बाहर निकल रहा था, तो उसकी मॉनिटरिंग के लिए तैनात ट्रैकिंग टीमें कहां थीं?
अवैध तारों पर चुप्पी क्यों? : यदि खेतों की रक्षा के लिए बिजली के करंट वाले तार लगाए गए थे तो विभाग की नाक के नीचे ये कैसे हो रहा था? फिर भी कार्रवाई के लिए बाघ की मौत का इंतजार क्यों?
‘टाइगर स्टेट’ का सपना या श्मशान?
एक तरफ बिहार सरकार बाघों की संख्या बढ़ने पर खुशी जाहिर करती है. वहीं दूसरी तरफ बुनियादी सुरक्षा के अभाव में हम अपनी ‘शान’ को खो रहे हैं. पुरैना गांव के पास हुई यह घटना सिस्टम की लापरवाही की ओर इशारा करती है. ऐसे में बिहार में बाघों का संरक्षण और उनकी जान भगवान भरोसे है. यदि फसल सुरक्षा संरक्षित जीव बाघों से ज्यादा कीमती है तो इसी तरह मौत के तार बिछते रहेंगे और संरक्षित जीवों की जान अभ्यारण्य में जाती रहेगी. ऐसे में वह दिन दूर नहीं जब वाल्मीकि टाइगर रिजर्व श्मशान बन जाएगा और रिजर्व सिर्फ कागजों पर ही नजर आएगा.
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