मैं कभी सोनपुर मेले की शान थी, अब देखने की चीज

सोनपुर : मैं गज हूं. जी हां, मैं हाथी हूं. मेरा नाम अनामिका है. सोनपुर मेले में आयी हूं. विश्व प्रसिद्ध इस सोनपुर मेले की पहचान मेरी खरीद-बिक्री से भी जुड़ी हुई है. मुझे जब ग्राह से परेशानी हुई थी तो स्वयं भगवान मुझे बचाने के लिये आये थे. अब मैं किसी मॉल में बिक […]

सोनपुर : मैं गज हूं. जी हां, मैं हाथी हूं. मेरा नाम अनामिका है. सोनपुर मेले में आयी हूं. विश्व प्रसिद्ध इस सोनपुर मेले की पहचान मेरी खरीद-बिक्री से भी जुड़ी हुई है. मुझे जब ग्राह से परेशानी हुई थी तो स्वयं भगवान मुझे बचाने के लिये आये थे. अब मैं किसी मॉल में बिक सकती नहीं. पुराने मालिक नये मालिक की तलाश के लिये मुझे सोनपुर मेले में लाये हैं. मुझे भी अपने नये मालिक की तलाश है. मेरे लिये अब ग्राह वन्य जीव अधिनियम बन गया है. 1972 के अधिनियम के तहत मेरी खरीद बिक्री पर रोक है. 2003 में इस कानून के और सख्त हो जाने के बाद मेरे नये मालिक के तलाश की आस और भी खत्म हो गयी. अब मैं महज दिखने के लिये मेले में आती हूं. कोई कुछ दे देता है तो प्यार से खा लेती हूं.

मेले की शान रहे हैं हाथी

कभी मैं इस मेले की शान होती थी. बदलते वक्त ने मुझे भी कानून के जंजीरों से बांध दिया. मुझे खरीदना और बेचना अपराध की श्रेणी में आने लगा और अब तो बस मेले में आना मेरे लिये रूटीन भर रह गया है. पैरों में जंजीर. पूरी तरह सजा-संवरा मेरा चेहरा. गले में बंधी घंटी और आस-पास लोगों का हुजूम मुझे इस बात का एहसास जरूर दिलाता है कि मेरी महता आज भी कम नहीं है. सोनपुर मेला देखने आये लोग एक बार मुझे जरूर देखते हैं. खरीद-बिक्री बंद होने से एक खुशी और भी होती है, अब जीवन मरण एक ही मालिक के साथ गुजर जाता है.

बिक्री पर प्रतिबंध

सोनपुर मेले में हाथी लेकर आये महावत रघुवीर सहनी बताते हैं कि 2003 में कानून के सख्ती से लागू हो जाने के बाद अब हाथियों की कैश खरीद बिक्री नहीं होती है. रघुवीर ने कहा कि अब हाथियों की बिक्री की जगह अदान-प्रदान का नियम अपनाया गया है. जिसके पास पहले से हाथी है, वह हाथी बदलकर ले जा सकते हैं. महावत ने बताया कि इससे पहले हाथी सोनपुर मेले में दान के नाम पर आते थे और उनका सौदा पिछले दरवाजे से होता था. हाथियों की खरीद बिक्री पर रोक होने की वजह से अब हाथी कम आते हैं.

इस बार मेले में मात्र 13 हाथी

सोनपुर के मेले में गत वर्षों की बात करें तो 2011 में 29 हाथी, 2012 में 37,2013 में 35, 2014 में 39 और 2015 के मेले में केवल 14 हाथी आये. वन्य जीव अधिनियम और वन विभाग की सख्ती के बाद सोनपुर मेले में आने वाले हाथियों की संख्या में लगातार कमी आती गयी. 2016 में मात्र 13 हाथी ही मेले में पहुंचे, वह भी तीन से चार दिनों के बाद चले गये. बिहार पर्यटन विभाग के अधिकारी बताते हैं कि हाथियों का सोनपुर मेले में आना महज एक रस्म अदायगी भर है. हाथी चूकी आकर्षण का केंद्र हैं इसलिए उन्हें देखने के लिये भी लोग मेले में आते हैं.

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