वैशाली का ऐसा गांव, जिसकी रखवाली करते हैं चमगादड़

हाजीपुर (वैशाली) : जिला मुख्यालय हाजीपुर से करीब 15 किलोमीटर उत्तर हाजीपुर-महुआ मुख्य मार्ग के पश्चिम-उत्तर कोने पर स्थित है राजापाकर प्रखंड का सरसई फतेहपुर गांव. इसी गांव में लगभग 52 एकड़ भू-भाग में फैला है एक सरोवर, जो सरसई सरोवर के नाम से विख्यात है. इसी सरोवर के किनारे लगे बरगद, पीपल, सिमल, जामुन, […]

हाजीपुर (वैशाली) : जिला मुख्यालय हाजीपुर से करीब 15 किलोमीटर उत्तर हाजीपुर-महुआ मुख्य मार्ग के पश्चिम-उत्तर कोने पर स्थित है राजापाकर प्रखंड का सरसई फतेहपुर गांव. इसी गांव में लगभग 52 एकड़ भू-भाग में फैला है एक सरोवर, जो सरसई सरोवर के नाम से विख्यात है. इसी सरोवर के किनारे लगे बरगद, पीपल, सिमल, जामुन, कदम आदि पौधे पर स्तनधारी पक्षी चमगादड़ों ने अपना निवास स्थल बना रखा है. ग्रामीणों का कहना है कि चमगादड़ों के रहने से उनके गांव में सैकड़ों वर्षो से चोरी-डकैती की घटना नहीं हुई है. रात के अंधेरे में जब कोई बाहरी या अवांछित व्यक्ति गांव में प्रवेश करने की चेष्टा करता है, तब चमगादड़ आवाज कर पूरे गांव को सचेत कर देते हैं. चमगादड़ों का झुंड चिल्लाते हुए गांव में प्रवेश कर जाते हैं.

चमगादड़ों की आपातकालीन चिल्लाहट से गांव के बुजुर्ग, नौजवान और महिलाएं भी वाकिफ हैं. सरसई गांव निवासी सह सरपंच संघ के प्रदेश नेता अमोद कुमार निराला, भाजपा युवा मोर्चा के मीडिया प्रभारी नीरज कुमार शर्मा, शंभू शर्मा, ब्रजनंदन शर्मा आदि का कहना है कि देर रात में चमगादड़ों की आवाज पर लोग पारंपरिक हथियारों से लैस होकर घर से निकल पड़ते हैं. गांव के नवयुवक सीमा पर पहुंच जाते हैं. एक बार नहीं बल्कि कई बार चमगादड़ों की आवाज पर गांव वाले जगे हैं और गांव में प्रवेश कर रहे चोर, डाकुओं को खदेड़ा है.चमगादड़ों के प्रति ग्रामीणों की आस्था ऐसी है कि न तो गांव का कोई व्यक्ति इन्हें मारने या भगाने का प्रयास करता है और न ही किसी बाहरी व्यक्ति को ऐसा करने दिया जाता है.

प्रहरी मानकर गांव वाले चमगादड़ों की करते हैं पूजा
आसपास के गांव में लोग लगाते हैं फलदार पेड़, छोड़ देते हैं ऊपर के फल
सरोवर में पानी सूखने पर छतों पर पानी रख करते हैं वैकल्पित व्यवस्था
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
प्राचीन काल में बनाये गये सरोवर के किनारे फलदार पौधे लगाये गये थे. पानी और भोजन मिलने के कारण विभिन्न जगहों से यहां चमगादड़ आकर रहने लगे. आसपास के गांव के लोग भी फलदार पौधे लगाते हैं और चमगादड़ों के भोजन के लिए फलदार पौधों के ऊपर के फल को छोड़ देते हैं. आसपास के क्षेत्रों से भोजन में फल और पीने के लिये सरोवर से पानी उपलब्ध होने के कारण लाखों की संख्या में चमगादड़ों ने यहां अपना आशियाना बना रखा है.
डॉ सत्येंद्र कुमार, जंतु विज्ञान विभागाध्यक्ष, एस एन कॉलेज, हाजीपुर
सात किलो वजन तक के हैं चमगादड़
सरसई गांव के पेड़ों पर लटके चमगादड़ों में तीन प्रजाति के चमगादड़ हैं. वन विभाग के पदाधिकारियों की माने तो एक प्रजाति जो अनूमन घरों में भी पाये जाते हैं. इसका वजन 50 ग्राम से 200 ग्राम तक होता है. दूसरी प्रजाति जिसका वजन 100 ग्राम से 300 ग्राम तक की है. तीसरी प्रजाति बड़े आकार वाले चमगादड़ों की है. इस प्रजाति के चमगादड़ का मुंह बंदर की तरह है. हाथ-पैर में 20 नाखून और इंसानों की तरह 32 दांत इस प्रजाति की पहचान है. इसका वजन औसतन 500 ग्राम से पांच किलो तक है. सरसई गांव में सात किलो तक इस प्रजाति के चमगादड़ हैं.

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