देसरी : अगर हौसला बुलंद हो, तो कोई भी मुकाम पाया जा सकता है. इसी की मिसाल पेश कर रहा है अरुण सहनी, जो वैशाली जिले के सबसे छोटे प्रखंड देसरी के गाजीपुर का रहने वाला है. वह गाजीपुर उफरौल चौक पर अपने भाई के साथ साइकिल मरम्मत करने और पंचर बनाने की दुकान में […]
By Prabhat Khabar Digital Desk | Updated at :
देसरी : अगर हौसला बुलंद हो, तो कोई भी मुकाम पाया जा सकता है. इसी की मिसाल पेश कर रहा है अरुण सहनी, जो वैशाली जिले के सबसे छोटे प्रखंड देसरी के गाजीपुर का रहने वाला है. वह गाजीपुर उफरौल चौक पर अपने भाई के साथ साइकिल मरम्मत करने और पंचर बनाने की दुकान में बतौर मिस्त्री का काम करता है.
साइकिल की दुकान में मिस्त्री का काम कर अपने मुकाम हासिल करने का सपना संजोये अरुण सहनी कई मैराथन दौड़ में धावक के रूप में हिस्सा लेकर पदक और मेडल जीत चुका है. उसकी लगन, मेहनत से स्थानीय लोग कायल है. वह हमेशा अपने मुकाम को हासिल करने के लिए अपने परिश्रम के बल पर तत्पर रहता है. धावक अरुण ने देश के कई प्रांतों में मैराथन दौड़ में धावक के रूप में भाग लेकर अच्छे स्थान प्राप्त कर जिला ही नहीं, पूरे राज्य का नाम रोशन करने का काम किया है.
देश के राजधानी से लेकर कई अन्य प्रांतों में मैराथन में लगायी दौड़ : राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लेकर देश के कई अन्य जगहों पर हाफ और फुल मैराथन में भाग लेने वाले युवक अरुण ने 29 जनवरी 2017 को पुणे इंटरनेशनल मैराथन में 42.19 किलोमीटर की दौड़ में देश स्तर पर आठवां एवं विश्व स्तर पर 22वां स्थान प्राप्त किया. वहीं स्टैंडर्ड चार्टर्ड मुंबई मैराथन में 42.19 किलोमीटर की दौड़ में 15 जनवरी 2017 को ग्रुप में सातवां स्थान व फाइनल में 13 वां स्थान प्राप्त किया.
18 जनवरी 2016 को कोलकाता में टाटा स्टील मैराथन में 25 किलोमीटर की दौड़ में 13वां स्थान प्राप्त किया. छह दिसंबर 2015 को 30 पुणे इंटरनेशनल मैराथन में छठा स्थान प्राप्त किया. वहीं स्टैण्डर्ड चार्टर्ड मुंबई मैराथन में 42.19 किलोमीटर की दौड़ में 18 जनवरी 2015 को दो घंटा 54 मिनट 28 सेकेंड में दौड़ कर चौथा स्थान प्राप्त किया था. इसी दौड़ में 19 जनवरी 2014 को दो घंटा 33 मिनट आठ सेकेंड में 42.19 किमी की दूरी तय कर तीसरा स्थान प्राप्त किया था. वैशाली जिला एथलेटिक्स एसोसिएसन के द्वारा 12 फरवरी 2017 को आयोजित रन फॉर बिहार में छह किलामीटर की दौड़ में प्रथम स्थान प्राप्त किया था.
सरकारी स्तर पर मदद नहीं मिलने से परिवार में निराशा
धावक अरुण की स्थिति आर्थिक रूप से काफी पिछड़े होने के बावजूद इस होनहार युवक को सरकारी स्तर से कोई आवश्यक मदद नहीं मिलने के कारण उनके पारिवारिक सदस्यों में कभी-कभी निराशा होने लगाती है. मैराथन दौड़ में परचम लहराने वाले युवक के भाई प्रभु सहनी का कहना है कि मजदूरी और साइकिल का पंचर बना कर परिवार चलाने की विवशता के बावजूद हमारा भाई मैराथन दौड़ में अपने परिश्रम के बल पर उच्च मुकाम हासिल कर स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाना चाहता है. वह देश के कई राज्यों में दौड़ कर अच्छे स्थान प्राप्त किया है. जिसमें वह पदक और मेडल भी जीत चुका है. लेकिन सरकारी स्तर से मदद नहीं मिलने से हमलोगों में कभी-कभी आशाएं टूटने लगती है.
स्थानीय सांसद सह केंद्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री से है उम्मीद
धावक अरुण को उम्मीद है कि स्थानीय सांसद सह केंद्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री विभाग के मंत्री रामविलास पासवान उन्हें आवश्यक सरकारी सुविधा मुहैया करायेंगे, जिससे की वह मैराथन की तैयारी कर सके. युवक का कहना है कि मैं तो लगातार मेहनत कर देश के लिए मैराथन में दौड़कर अपना लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रयत्नशील हूं, लेकिन सरकारी स्तर से अभी तक कोई मदद नहीं मिल रही है. उसने पूर्व में राज्य सरकार के कई मंत्री, विधायकों तथा संबंधित विभाग के उच्चाधिकारी का दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोई मदद नहीं मिली. स्थानीय सांसद सह केंद्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री विभाग के मंत्री रामविलास पासवान से उसे उम्मीद है कि वह हर संभव मदद करेंगे.
हैदराबाद में हाफ मैराथन दौड़ में लिया था भाग
सबसे पहला दौड़ हैदराबाद में 20 अगस्त 2009 को हाफ मैराथन में शुरुआत की थी. जो पहले दौड़ में 108वां स्थान प्राप्त करने के बाद लगातार सफलता की सीधी चढ़ते गये और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. आर्थिक रूप से काफी पिछड़े होने के बाद भी धावक अरुण ने अपने गरीबी की चिंता किये बिना अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमेशा तत्पर रहा है. अरुण का सपना है कि वह भारत के लिए मैराथन में दौड़ लगाकर स्वर्ण पदक जीते.
जिसके लिए वह प्रतिदिन सुबह में मेहनत कर रहा है. उसके बाद वह भाई के साइकिल दुकान में अपने रोजी-रोटी के लिए साइकिल का पंचर बनाने का कार्य करने जाता है. अपनी सफलता में मदद के लिए धावक अरुण ने कई बार राज्य सरकार से मदद की गुहार लगा चुका है, पर कुछ हासिल नहीं हुआ.