ग्रामीण रोजगार नीति में होगा ऐतिहासिक बदलाव, 125 दिनों की गारंटी से मजबूत होगी गांवों की अर्थव्यवस्था : बबलू

वर्ष 2005 में लागू मनरेगा ने ग्रामीण आय को स्थिर करने में अहम भूमिका निभाई है

सुपौल. वीणा रोड स्थित भारतीय जनता पार्टी कार्यालय में शुक्रवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिहार सरकार के पूर्व मंत्री सह छातापुर विधानसभा विधायक नीरज कुमार सिंह बबलू ने ग्रामीण रोजगार नीति में प्रस्तावित बड़े बदलावों की विस्तृत जानकारी दी. उन्होंने कहा कि पिछले दो दशकों से ग्रामीण रोजगार भारत की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ रहा है. वर्ष 2005 में लागू मनरेगा ने ग्रामीण आय को स्थिर करने में अहम भूमिका निभाई है. विधायक बबलू ने कहा कि समय के साथ ग्रामीण भारत की सामाजिक-आर्थिक संरचना में व्यापक बदलाव आए हैं. डिजिटल कनेक्टिविटी, आय स्तर में वृद्धि, विविध आजीविका के अवसर और बेहतर बुनियादी सुविधाओं के कारण अब ग्रामीण रोजगार की प्रकृति बदल चुकी है. ऐसे में मनरेगा की मौजूदा संरचना समकालीन आवश्यकताओं से पूरी तरह मेल नहीं खा रही है. उन्होंने कहा कि डिजिटल भुगतान, आधार-आधारित प्रणाली और जियो-टैग्ड परिसंपत्तियों जैसे सकारात्मक बदलाव भी सामने आए है. हालांकि, कई राज्यों में काम की कमी, मशीनों का दुरुपयोग, डिजिटल उपस्थिति प्रणाली का उल्लंघन और असंतुलित व्यय जैसी समस्याएं भी बनी रही. महामारी के बाद बहुत कम परिवार 100 दिन का पूरा रोजगार हासिल कर पाए. इन अनुभवों के आधार पर सरकार ने “विकसित भारत रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक 2025” का प्रस्ताव रखा है. यह विधेयक विकसित भारत 2047 के लक्ष्य से जुड़ा हुआ है. इसके तहत प्रशासनिक व्यय की सीमा 06 प्रतिशत से बढ़ाकर 09 प्रतिशत कर दी गई है. जिससे बेहतर स्टाफिंग, प्रशिक्षण और तकनीकी क्षमता विकसित की जा सकेगी. विधायक कहा कि नए विधेयक के तहत ग्रामीण परिवारों को प्रति वर्ष 125 दिन का मजदूरी आधारित रोजगार मिलेगा. खेती के बुआई और कटाई के मौसम में 60 दिन का नो-वर्क पीरियड रहेगा. ताकि कृषि कार्य प्रभावित न हो. मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक या अधिकतम 15 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से किया जाएगा. कहा कि नया मिशन चार प्राथमिक विकास क्षेत्रों पर केंद्रित होगा. जल संरक्षण और जल सुरक्षा, ग्रामीण सड़क व कनेक्टिविटी, आजीविका आधारित बुनियादी ढांचा, जलवायु अनुकूलन कार्य शामिल है. इस योजना का अनुमानित वार्षिक व्यय 1.51 लाख करोड़ रुपये होगा. जिसमें केंद्र का योगदान लगभग 95,692 करोड़ रुपये रहेगा. सामान्य राज्यों के लिए लागत अनुपात 60:40, पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 90:10 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत केंद्रीय वित्त पोषण होगा. विधेयक में पारदर्शिता और जवाबदेही पर विशेष जोर दिया गया है. सामाजिक लेखा परीक्षा, डिजिटल उपस्थिति, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और एआई आधारित निगरानी प्रणाली लागू की जाएगी. काम न मिलने पर 15 दिनों के बाद बेरोजगारी भत्ता देने की जिम्मेदारी राज्यों की होगी. विधायक ने कहा कि यह विधेयक रोजगार को उत्पादक परिसंपत्तियों से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती देगा. जिससे आय बढ़ेगी, पलायन घटेगा और किसानों व मजदूरों के हित सुरक्षित होंगे. इस अवसर पर जिलाध्यक्ष नरेन्द्र ऋषिदेव, पूर्व सांसद विश्वमोहन कुमार, नगर परिषद मुख्य पार्षद राघवेन्द्र झा राघव, डॉ विजय शंकर चौधरी, रामकुमार राय, कुणाल ठाकुर, सचिन माधोगड़िया, विनय भूषण सिंह, सुरेंद्र नारायण पाठक, रंधीर ठाकुर, पिंटू मंडल, केशव गुड्डू, राहुल झा, महेश देव, सीमा कुशवाहा आदि कार्यकर्ता मौजूद थे.

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