तिल-गुड़ की मिठास और चूड़ा-दही की सोंधी खुशबू से महकने लगा मिथिलांचल

तिल-गुड़ की मिठास और चूड़ा-दही की सोंधी खुशबू से महकने लगा मिथिलांचल

सुपौल.

मिथिलांचल में मकर संक्रांति का पर्व आते ही गांव से शहर तक उत्सव का माहौल बन गया है. हर घर से तिल और शक्कर की मीठी सुगंध उठ रही है. महिलाएं रसोई में पारंपरिक व्यंजन बनाने में जुट गई हैं, वहीं बाजारों में तिल, गुड़, चूड़ा, चावल, दाल और मसालों की खूब खरीदारी हो रही है. खासकर तिल लाय (तिल के लड्डू) और खिचड़ी की तैयारी को लेकर लोगों में खास उत्साह देखा जा रहा है. मकर संक्रांति मिथिलांचल की सबसे प्रमुख लोक-सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है. इस दिन सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के साथ ही शुभ कार्यों की शुरुआत मानी जाती है. मिथिला में इसे “तिल संक्रांति ” भी कहा जाता है. इस दिन तिल और गुड़ से बने व्यंजनों का विशेष महत्व होता है.

घर-घर में पारंपरिक पकवानों की तैयारी

शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों में सुबह से ही घरों में चूल्हे जलने लगे हैं. महिलाएं तिल भूनकर लाय बनाने में जुटी हैं. तिल, गुड़ और शक्कर से बने लड्डू, पुआ, खिचड़ी, दही-चूड़ा और चावल के पकवान हर घर की रसोई में तैयार किए जा रहे हैं. गृहिणी सीता देवी बताती हैं मकर संक्रांति पर तिल लाय और खिचड़ी बनाना हमारी परंपरा है. इससे घर में सुख-समृद्धि आती है और ठंड के मौसम में तिल शरीर को गर्मी भी देता है.

बाजारों में रौनक, व्यापारियों की चांदी

पर्व को लेकर सुपौल के मुख्य बाजार, सब्जी मंडी और ग्रामीण हाट-बाजारों में भारी भीड़ देखी जा रही है. तिल, गुड़, चूड़ा, अरवा चावल, उड़द दाल, सब्जियों और मसालों की बिक्री में काफी तेजी आई है. मिठाई दुकानों पर भी तिल के लड्डू, गजक और रेवड़ी व दूध की मांग बढ़ गई है. स्थानीय दुकानदार रमेश साह कहते हैं, मकर संक्रांति से पहले तिल और गुड़ की बिक्री कई गुना बढ़ जाती है. लोग घर के साथ-साथ रिश्तेदारों के लिए भी सामान खरीदते हैं.

सामाजिक मेल-जोल का पर्व

मिथिलांचल में मकर संक्रांति सिर्फ खाने-पीने का पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और आपसी मेल-जोल का प्रतीक भी है. लोग एक-दूसरे के घर जाकर तिल लाय, दही-चूड़ा और खिचड़ी खाते हैं. बुजुर्ग बच्चों को आशीर्वाद देते हैं. ग्रामीण इलाकों में अब भी परंपरागत तरीके से सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है. कई जगहों पर गांव के लोग मिलकर खिचड़ी पका कर पूरे गांव में बांटी जाती है.

धार्मिक आस्था से जुड़ा है पर्व

मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व भी खास है. इस दिन गंगा स्नान, सूर्य पूजा और दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है. सुपौल और आसपास के क्षेत्रों में सुबह से ही लोग नदी, तालाब और पोखरों में स्नान कर सूर्यदेव को अर्घ्य देते नजर आते हैं. पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र बताते हैं, मकर संक्रांति से खरमास समाप्त होता है. इसके बाद विवाह और अन्य शुभ कार्य शुरू होते हैं. तिल का दान करने से पुण्य मिलता है.

पतंगबाजी व बच्चों में उत्साह

बच्चों के लिए यह पर्व किसी त्योहार से कम नहीं है. उन्हें तिल के लड्डू, मिठाइयां और नए कपड़े मिलते हैं. कई जगहों पर पतंगबाजी का भी चलन है, जिससे आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है. छात्रा प्राची कहती हैं, हमें तिल लाय बहुत पसंद है. दोस्तों के साथ मिलकर खाते हैं और खूब मस्ती करते हैं.

परंपरा व आधुनिकता का संगम

जहां एक ओर लोग पारंपरिक तरीके से पर्व मना रहे हैं, वहीं आधुनिकता का असर भी साफ दिख रहा है. सोशल मीडिया पर लोग तिल लाय, खिचड़ी और पर्व से जुड़े फोटो व वीडियो साझा कर रहे हैं. शहरों में कुछ लोग रेडिमेड मिठाइयां खरीदकर भी पर्व की खुशियां मना रहे हैं. कुल मिलाकर, सुपौल सहित पूरे मिथिलांचल में मकर संक्रांति की तैयारियों ने माहौल को उल्लासमय बना दिया है.

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