पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न हुआ सहस्त्र चंडी महायज्ञ: श्रद्धा, भक्ति और संस्कृति का अनुपम संगम
इस अवसर पर क्षेत्रभर से श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा, जिससे आयोजन ऐतिहासिक और अलौकिक बन गया
सुपौल. नौ दिवसीय सहस्त्र चंडी महायज्ञ एवं श्रीमद् देवी भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ का समापन सोमवार पूर्णाहुति के साथ भक्तिपूर्ण वातावरण में हुआ. इस अवसर पर क्षेत्रभर से श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा, जिससे आयोजन ऐतिहासिक और अलौकिक बन गया. मुख्य यजमान प्राणेश्वर मिश्र एवं धर्मपत्नी कल्पना मिश्र ने विधिवत पूजन कर पूर्णाहुति प्रदान की, जिसके साथ यज्ञ की समस्त विधियां पूर्ण हुई. यज्ञस्थल पर जनमानस की आस्था का दृश्य भावविभोर करने वाला था. यज्ञाचार्य पंडित जीवेश्वर मिश्र ने यज्ञ की पूर्णता पर प्रकाश डालते हुए कहा, जब कोई शुभ कार्य प्रकृति के सहयोग से प्रारंभ होता है और सभी का सामूहिक प्रयास बिना विघ्न के जुड़ता है, तब उसका समापन परम कल्याणकारी होता है. यह यज्ञ समाज कल्याण और आत्मिक जागरण का जीवंत उदाहरण बना. घने बादलों में देव उपस्थिति की अनुभूति समापन दिवस पर एक दुर्लभ दृश्य तब देखने को मिला जब मंत्रोच्चारण प्रारंभ होते ही आकाश में घने बादल उमड़ आए. श्रद्धालुओं ने इसे देवगणों की उपस्थिति और आशीर्वाद का प्रतीक माना. यह पल सभी उपस्थित जनों को गहरे आध्यात्मिक भाव में डुबो गया. पंडित कन्हैया झा, चंदन झा, मनोज कुमार झा, वैद्यनाथ झा एवं मणिरमण झा जैसे विद्वान आचार्यों के नेतृत्व में अंतिम हवन विधिवत सम्पन्न हुआ. मंत्रोच्चारण की गूंज और अग्निहोत्र की दिव्यता ने संपूर्ण यज्ञस्थल को देवीमय ऊर्जा से भर दिया. देवी के पुनः अवतरण की भविष्यवाणी से भावविभोर हुए श्रद्धालु श्रीमद् देवी भागवत पुराण कथा के अंतिम दिवस पर आचार्य शुकदेवानंद व्यास ने देवी के पुनः अवतरण, उनके स्वरूप और त्रिदेवों के कार्यों में उनके सहायक रूप पर गूढ़ आध्यात्मिक विवेचन प्रस्तुत किया. कथा के दौरान संपूर्ण पंडाल भक्ति-भाव में सराबोर हो गया. इस पावन अवसर पर अमरेश पाठक, योगानंद पाठक, बिनोद पाठक, रामेश्वर पाठक, अमित झा, अजीत पाठक, सुबोध पाठक, बीरेंद्र चौधरी, दिनेश बाबा, भगवानजी पाठक, संजू देवी, नीलम देवी, विनिता पाठक, कपिल कश्यप सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे. सभी ने इसे एक आध्यात्मिक पर्व के रूप में आत्मसात किया. अनुष्ठान नहीं, संस्कृति और समरसता का उत्सव यह महायज्ञ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक परंपरा और आस्था का सजीव प्रतीक बना. आयोजन समिति की बेहतरीन व्यवस्थाओं ने श्रद्धालुओं को न सिर्फ आध्यात्मिक संतोष दिया, बल्कि सेवा, सुरक्षा और सुविधा का उत्कृष्ट अनुभव भी प्रदान किया.
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