दीपावली की रौनक बढ़ाने में जुटे कुम्हार, आधुनिक झालरों की चमक में फीकी पड़ती मिट्टी के दीयों की रोशनी

दीपावली पर धनलक्ष्मी की कृपा पाने के लिए मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा आज भी कायम है

– सुपौल के कुम्हार परिवार परंपरागत धंधे को जिंदा रखने में कर रहे संघर्ष सुपौल. दीपावली का पर्व नजदीक आते ही सुपौल शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक कुम्हारों की बस्तियों में रौनक लौट आई है. हर ओर चाक की घूमती थाली पर मिट्टी के दीये, ढिबरी और मटकी आकार ले रहे हैं. मिट्टी की सोंधी खुशबू और चाक की लयबद्ध गति के बीच कुम्हार परिवार पूरी मेहनत से इस परंपरा को जीवित रखने में जुटे हैं. दीपावली पर धनलक्ष्मी की कृपा पाने के लिए मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा आज भी कायम है. इसी उम्मीद में कुम्हारों ने अपने घरों को कार्यशाला बना दिया है कोई मिट्टी गूंथ रहा है, तो कोई दीये को आकार दे रहा है, जबकि बच्चे और महिलाएं तैयार बर्तनों को सुखाने और सजाने में लगे हैं. परिवार के हर सदस्य की भूमिका इस सामूहिक श्रम में स्पष्ट दिखती है. हालांकि, कुम्हारों के लिए यह धंधा अब सिर्फ सिजनल आय का साधन बनकर रह गया है. स्थानीय कुम्हार देवन पंडित, रवि पंडित, सुंदर पंडित और सोनी देवी बताते हैं कि दीपावली और गर्मी के मौसम में ही कुछ आमदनी हो पाती है, बाकी समय वे मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं. उन्होंने बताया कि दीये और ढिबरी की कीमत एक रुपये से लेकर पांच रुपये तक ही होती है, जिससे खास मुनाफा नहीं हो पाता. बाजार में इलेक्ट्रॉनिक झालरों और सजावटी वस्तुओं की बढ़ती चमक ने मिट्टी के दीपकों की मांग को काफी घटा दिया है. लोग अब इन्हें सिर्फ पूजन के लिए ही खरीदते हैं, जिससे पारंपरिक मिट्टी कला धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही है. कुम्हारों ने सरकार से आग्रह किया है कि उन्हें आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण योजनाओं से जोड़ा जाए, ताकि यह पारंपरिक कला न केवल जीवित रहे बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक गर्व से पहुंचे.

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