Krishna Janmashtami 2026: सुपौल. जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का इंतजार इस बार 4 सितंबर की आधी रात को खत्म होगा. जैसे ही रात के 12 बजेंगे, शंख और घंटियों का नाद गूंजेगा और भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की विशेष पूजा शुरू होगी. इसके अगले दिन यानी 5 सितंबर को श्रद्धालु कृष्णाष्टमी व्रत का पारण करेंगे. सुपौल के त्रिलोकधाम गोसपुर निवासी मैथिल पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने जन्माष्टमी की तिथि, मध्यरात्रि पूजा और व्रत पारण को लेकर यह जानकारी दी है.
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व इस वर्ष 4 सितंबर को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा. भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है. मंदिरों और घरों में पूजा की तैयारियां शुरू हो गयी हैं और श्रद्धालु जन्माष्टमी की रात होने वाली विशेष पूजा को लेकर उत्सुक हैं.
आधी रात को क्यों मनाया जाता है श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव
आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि में हुआ था. इसी वजह से जन्माष्टमी की रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की विशेष पूजा-अर्चना करने की परंपरा है.
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अधर्म का नाश करने तथा धर्म, सत्य और न्याय की स्थापना के लिए अवतार लिया था. उनका जीवन मानव समाज को धर्म, कर्म, सत्य, प्रेम और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है. यही वजह है कि देशभर में जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है.
4 सितंबर की रात 12 बजे गूंजेगा शंख-घंटे का नाद
जन्माष्टमी की रात श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय का इंतजार करेंगे. आचार्य मिश्र के अनुसार व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर भक्ति भाव से व्रत का संकल्प लेना चाहिए. इसके बाद दिवा-रात्रि व्रत का संकल्प लेकर भगवान श्रीकृष्ण का चिंतन, भजन और कीर्तन करना चाहिए.
रात में श्रद्धालु सामूहिक रूप से भगवान के भजन-कीर्तन में शामिल हो सकते हैं. जैसे ही मध्यरात्रि के 12 बजेंगे, शंख, घंटी और अन्य वाद्य यंत्रों के साथ स्वस्तिवाचन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा.
जन्मोत्सव के बाद भगवान श्रीकृष्ण का जयकारा लगाया जाएगा. इसके बाद शास्त्रोक्त विधि से पूजा और आरती करने की परंपरा है. श्रद्धालु भगवान को विभिन्न प्रकार के मिष्ठान और पकवानों का भोग भी लगाएंगे.
जन्माष्टमी पर क्या-क्या चढ़ेगा भोग
भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के बाद भोग लगाने की भी विशेष परंपरा है. आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि अगले दिन प्रातः नित्य क्रिया से निवृत्त होकर भगवान श्रीकृष्ण की विधिवत पूजा-अर्चना करनी चाहिए.
इसके बाद खीर, पूरी, मालपुआ, मोदक सहित विभिन्न मिष्ठान और पकवानों का भोग भगवान को लगाया जाएगा. भोग के बाद श्रद्धालु विधि-विधान के अनुसार अपने व्रत का पारण करेंगे.
इस तरह जन्माष्टमी का मुख्य क्रम 4 सितंबर की रात भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव और 5 सितंबर को व्रत पारण के साथ पूरा होगा. श्रद्धालु दिनभर उपवास और भगवान के स्मरण के बाद मध्यरात्रि में जन्मोत्सव मनाएंगे और अगले दिन पूजा-अर्चना तथा भोग के बाद व्रत खोलेंगे.
Krishna Janmashtami 2026: जन्माष्टमी सिर्फ पर्व नहीं, जीवन जीने का संदेश भी
आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने कहा कि जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है. यह धर्म, सत्य, प्रेम और कर्म के मार्ग पर चलने का संदेश देने वाला पावन अवसर है. भगवान श्रीकृष्ण का जीवन मनुष्य को परिस्थितियों के बीच अपने कर्तव्य का पालन करने और सत्य के रास्ते पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.
उन्होंने कहा कि श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक शांति की अनुभूति होती है. यही कारण है कि जन्माष्टमी पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में भगवान के जन्मोत्सव में शामिल होते हैं.
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