जदिया का कीर्तन घाट अष्टयाम परंपरा का है ऐतिहासिक केंद्र

यहीं से शुरू हुई अष्टयाम परंपरा

जदिया. इलाके की आस्था, संस्कृति और धार्मिक परंपरा का प्रमुख केंद्र बना कीर्तन घाट आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है. स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, वर्ष 1902 ई. में कीर्तन घाट की स्थापना हुई थी. स्थापना के बाद यहां भव्य महायज्ञ का आयोजन किया गया, जिसके पश्चात अष्टयाम की परंपरा की शुरुआत हुई जो आज भी श्रद्धा और भक्ति का प्रमुख आधार बनी हुई है. बुजुर्गों का कहना है कि उस समय धार्मिक आयोजनों के लिए यह स्थल सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था. महायज्ञ में दूर-दूर से साधु-संत, विद्वान और श्रद्धालु पहुंचे थे. यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद अखंड हरिनाम संकीर्तन और अष्टयाम की परंपरा शुरू की गई, जिसने पूरे क्षेत्र में धार्मिक चेतना का संचार किया. यहीं से शुरू हुई अष्टयाम परंपरा स्थानीय लोगों के अनुसार, अष्टयाम की शुरुआत इसी कीर्तन घाट से हुई थी, जो धीरे-धीरे आसपास के गांवों और अन्य क्षेत्रों तक फैल गई. आज भी जब कहीं अष्टयाम का आयोजन होता है, तो लोग इस ऐतिहासिक स्थल को श्रद्धा से याद करते हैं. समय के साथ कई पीढ़ियां बदलीं, लेकिन कीर्तन घाट की महत्ता आज भी बरकरार है. यहां नियमित रूप से पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं. ग्रामीण और श्रद्धालु इसे अपनी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संजोए हुए हैं. मंदिर निर्माण से बढ़ी रौनक इन दिनों ग्रामीणों के सहयोग से यहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है. छत ढलाई का कार्य पूरा होने के बाद लोगों में उत्साह और बढ़ गया है. ग्रामीणों का मानना है कि मंदिर निर्माण के बाद यह स्थल धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान का बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा.

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By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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