शतचंडी महायज्ञ में श्रद्धा, भक्ति व आध्यात्मिक ज्ञान का दिखा दिव्य संगम देवी भागवत पुराण की महिमा का हुआ विस्तृत वर्णन सुपौल. सदर प्रखंड अंतर्गत बरुआरी पश्चिम स्थित मां दुर्गा, दस महाविद्या, नवग्रह व कृष्ण मंदिर परिसर में आयोजित भव्य शतचंडी महायज्ञ के चौथे दिन बुधवार को श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था, श्रद्धा और उत्साह का वातावरण बना रहा. मंदिर परिसर और यज्ञ स्थल मंत्रोच्चारण, हवन की सुगंध और जय माता दी के जयघोष से गुंजायमान रहा. सुबह से लेकर देर शाम तक श्रद्धालुओं की निरंतर आवाजाही बनी रही. पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूबा नजर आया. यह शतचंडी महायज्ञ सुप्रसिद्ध पौराणिक कथावाचक आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री पौराणिक महाराज के निर्देशन में विधिवत रूप से संपन्न कराया जा रहा है. श्रद्धालुओं में महिलाओं, पुरुषों, बुजुर्गों और युवाओं की उपस्थिति ने आयोजन को और भी भव्य स्वरूप प्रदान किया. शास्त्रीय विधि-विधान से हुआ पूजा-अर्चना प्रातःकाल से ही यज्ञ स्थल पर धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम प्रारंभ हो गया. उपाचार्य पवन पांडेय व ब्रह्मा शास्त्री हिमांशु त्रिपाठी द्वारा शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार, मुख्य यजमान सहित अनेक यजमानों को पूजा-अर्चना करायी गयी. यजमानों ने वेद मंत्रों के उच्चारण के बीच अग्निदेव को पूर्ण आहुति अर्पित की. सुबह से दोपहर तक चले इस अनुष्ठान में यजमानों ने अपने परिवार की सुख-शांति, आरोग्यता, समृद्धि व समाज के कल्याण की कामना की. मंत्रोच्चारण और हवन की पवित्र अग्नि के बीच उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर नजर आये. श्रीमद्भागवत कथा में आध्यात्मिक विज्ञान पर विशेष प्रवचन श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन कथा वाचक आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री ने अपने प्रवचन में सृष्टि के रहस्यमय विज्ञान और देवी तत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि सृष्टि चक्र का विज्ञान मानव बुद्धि से परे है. मनुष्य द्वारा निर्मित किसी भी यंत्र या भौतिक साधन से यह रहस्य नहीं जाना जा सकता कि सृष्टि की रचना, पालन और संहार की तीनों शक्तियां एक ही समय पर किस प्रकार कार्य करती है. आचार्य ने कहा कि यह रहस्य केवल आध्यात्मिक विज्ञान के माध्यम से ही जाना जा सकता है. देवी पुराण में इस आध्यात्मिक विज्ञान को सर्ग और विसर्ग के रूप में वर्णित किया गया है. सर्ग का अर्थ सृष्टि की उत्पत्ति और विसर्ग का अर्थ सृष्टि का लय या संहार है. महा सरस्वती, महा लक्ष्मी और महा काली तीन शक्तियों का दिव्य स्वरूप कथा के दौरान आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री ने बताया कि इस आध्यात्मिक विज्ञान की तीन प्रधान देवियां हैं. महा सरस्वती, महा लक्ष्मी और महा काली. इन तीनों देवियों का जो मूल और संयुक्त स्वरूप है. वही महादेवी के नाम से विख्यात है. उन्होंने कहा कि महादेवी मनिद्वीप में निवास करती है. उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य और अद्भुत है. महादेवी की अठारह भुजाएं हैं. वे अपनी सभी भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करती है. यही महादेवी संपूर्ण ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री है और इन्होंने ही संपूर्ण सृष्टि का निर्माण किया है. ब्रह्मांड संचालन का दैवीय विधान आचार्य ने कहा कि महादेवी ने प्रत्येक ब्रह्मांड में तीन-तीन प्रधान देवों और देवियों को सृष्टि संचालन का कार्य सौंपा है. ब्रह्मा को महा सरस्वती के साथ सृष्टि रचना का कार्य, श्री विष्णु को महा लक्ष्मी के साथ सृष्टि के पालन का कार्य और भगवान शिव को महा काली के साथ संहार का कार्य प्रदान किया गया है. उन्होंने कहा कि इस प्रकार सभी देव और देवियां महादेवी की शक्ति, महिमा और माया के अधीन रहकर कार्य करते हैं. महादेवी की इच्छा के बिना इस संसार में कोई भी कार्य संभव नहीं हो सकता. संपूर्ण जगत का संचालन उन्हीं की शक्ति से होता है. देवी भागवत पुराण की महिमा का विस्तार से वर्णन कथा वाचक ने कहा कि इन्हीं महादेवी से संबंधित पुराण को देवी भागवत पुराण कहा जाता है. पुराण शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि पुराण वह होता है जो नित्य नूतन बना रहता है, फिर भी सर्वाधिक प्राचीन होता है. पुराण समस्त ईश्वरीय ज्ञान का भंडार है. इसी से परमात्म शक्ति का सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है. उन्होंने कहा कि देवी भागवत पुराण में मानव जीवन से संबंधित समस्त आध्यात्मिक, नैतिक और व्यावहारिक ज्ञान निहित है. यह पुराण केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण विधा सिखाता है. स्वयं को जानने के लिए पुराण का श्रवण, मनन व करें अध्ययन : आचार्य आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री ने अपने प्रवचन में कहा कि मनुष्य का परम कर्तव्य है कि वह स्वयं को जानने के लिए पुराण का श्रवण, मनन और अध्ययन करें. बिना देवी भागवत पुराण के अध्ययन के मानव जीवन कभी भी पूर्ण रूप से सफल और कृतार्थ नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि एक सफल, संतुलित और समृद्ध जीवन जीने के लिए, शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए, इस लोक में सुखी जीवन व्यतीत करने के लिए और परलोक की तैयारी के लिए जिस ज्ञान की आवश्यकता है, वह संपूर्ण ज्ञान देवी भागवत पुराण में विद्यमान है. श्रद्धा व भक्ति से होता है चतुर्वर्ग पुरुषार्थ की प्राप्ति कथा के दौरान आचार्य ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति एक बार भी श्रद्धा और भक्ति के साथ देवी भागवत पुराण का श्रवण कर लेता है, तो उसके ऊपर भगवती की संपूर्ण कृपा हो जाती है. ऐसा व्यक्ति चतुर्वर्ग पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सहज रूप से प्राप्त कर लेता है. उन्होंने कहा कि देवी की कृपा से मनुष्य का जीवन धन, धान्य, पुत्र और समृद्धि से परिपूर्ण हो जाता है. जीवन के अंत में वह मोक्ष को प्राप्त करता है और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है. श्रद्धालुओं में दिखा गहरा आध्यात्मिक भाव शतचंडी महायज्ञ के चौथे दिन कथा श्रवण के दौरान श्रद्धालु पूरी तरह ध्यानमग्न नजर आये. महिलाएं, पुरुष और बुजुर्ग सभी कथा को आत्मसात करते दिखे. कई श्रद्धालुओं की आंखों में भक्ति के भाव से आंसू छलकते नजर आये. श्रद्धालुओं ने बताया कि आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री का प्रवचन न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला है. उनके शब्दों से आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा की अनुभूति होती है. श्रद्धालुओं का रखा जा रहा खास ख्याल आयोजन समिति द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बेहतर व्यवस्थाएं की गयी हैं. यज्ञ स्थल पर स्वच्छता, पेयजल, बैठने की व्यवस्था और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जा रहा है. समिति के सदस्यों ने बताया कि आगामी दिनों में श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ने की संभावना है, जिसके लिए सभी तैयारियां की गयी है. कहा कि इस शतचंडी महायज्ञ और श्रीमद् भागवत कथा का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि समाज में आध्यात्मिक चेतना, नैतिक मूल्यों और आपसी सद्भाव को मजबूत करना भी है. भव्यता के साथ आगे बढ़ रहा है शतचंडी महायज्ञ बरुआरी पश्चिम में आयोजित शतचंडी महायज्ञ चौथे दिन भी पूरी भव्यता, अनुशासन और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ता नजर आया. देवी की उपासना, यज्ञ की आहुति और भागवत कथा के माध्यम से पूरा क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण हो गया है.
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